नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)
Naishadhiya Charitam of Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष / पं. शिवदत्त शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसर्गः २ ] जीवातु-मदयन्तिकासहितम् १११ पर ) आकाश-मार्ग में जाते हुए, सूर्य के अश्व-समूहों को—मानो चाबुक से हाँकते हुए, सूर्य-सारथि अरुण को—विश्राम दे रहे थे ॥८०॥ क्षितिगर्भधरान्वरालयैस्तलमध्योपरिपूर्णां पृथक् । जगतां खलु याखिलाद्भुताजनि सारैर्निजचिह्नधारिभिः ॥ ८१ ॥ क्षितीति । [ तलमध्योपरिपूर्णां ] तलमध्योपरि अधोमध्योर्ध्वदेशान् पूरयन्तीति तत्पूरिणां, जगतां = पातालभूमिखर्गाणां पृथक् = असङ्कीर्णं [ निज- चिह्नधारिभिः ] यानि निजानि प्रतिनियतानि निजचिह्नानि निध्यन्नपानस्रक्चन्द- नादिलिङ्गानि धारयन्तीति तद्धारिभिस्तथोक्तैः सारैः = उत्कृष्टैः [ क्षितिगर्भ-धराम्ब- रालयैः ] क्षितिगर्भे क्षितिकुहरे, पाताले धरायां भूपृष्ठे, अम्बरे आकाशे च, ये आलया गृहाः तैः भूम्यन्तर्बहिःशिरोगृहैरित्यर्थः । या = नगरी [ अखिलाद्भुता ] अखिला कृत्स्ना, अद्भुता चित्रा, अजनि = जाता । 'दीपजन' इत्यादिना जनेः कर्त्तरि लुङ्, च्लेश्चिणादेशः । खलु । अत्र क्षितिगर्भादीनां तलमध्योपरि जगत्सु सतां तच्चि- ह्नानाञ्च यथासंख्यसम्बन्धात् यथासंख्यालङ्कारः । एतेन त्रैलोक्यवैभवं गम्यते ॥८१॥ जो नगरी—तल ( निचली मञ्जिल, अर्थात् पाताल-स्वरूप ), मध्य ( बिचली मञ्जिल, अर्थात् भूलोकरूप ) और ऊपरी मञ्जिल (अर्थात् स्वर्गलोक स्वरूप ) को अपने रूप से व्याप्त करनेवाले, (अर्थात् पाताल, भूतल, स्वर्ग नामधारी) त्रिभुवन के श्रेष्ठ अंश से, पृथक्-पृथक्, अपने-अपने चिह्नों ( निचली मञ्जिल में पाताल चिह्न मणि आदि; बिचली मञ्जिल में भूतलचिह्न अनाज-पानी आदि; ऊपरी मञ्जिल में स्वर्गचिह्न स्थिरयौवना वराङ्गना, इत्र, फुलेल आदि ) को धारण करनेवाले, क्षितिगर्भस्थ भवनों (चोरी डकैती से बचने के लिए पातालचिह्न खजाना युक्त तहखाना वाले मकानों ), धरास्थित भवनों (भूतल पर बनी हुई दूसरी मञ्जिल में भूतलचिह्न अनाजपानी वाले मकानों) और अम्बर-स्थित भवनों (आकाशस्थित ऊपरी मञ्जिल में, तच्चिह्न स्थिरयौवना वराङ्गना, अङ्गराग आदि विलास के समस्त साधनों) द्वारा—समस्त नगरियों से बढ़कर आश्चर्यदायिनी हुई ॥ ८१ ॥ दधदम्बुदनीलकण्ठतां वहदत्यच्छसुधोज्ज्वलं वपुः। कथमुच्छ्लत्तु यत्र नाम न क्षितिभृन्मन्दिरमिन्दुमौलिताम् ॥ ८२ ॥ दधदिति । यत्र = नगर्याम् [ अम्बुद-नीलकण्ठतां ] अम्बुदैरम्बुदवन्नीलः कण्ठः शिखरोपकण्ठः गलश्च यस्य तस्य भावस्तत्ता ताम् । 'कण्ठो गले सन्निधाने' इति