नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)
Naishadhiya Charitam of Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष / पं. शिवदत्त शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५८ नैषधचरितम् । [ तृतीय- = अमृतपूरैर्मुखमापूरयति न पूरयतीत्यर्थः । किञ्च सृजौत = करोति ? न किञ्चित् करोतीत्यर्थः । दृष्टान्तालङ्कारः ॥५८॥ मेरी आँखों को-तुम्हारा दर्शन करने से-जो आनन्द प्राप्त हुआ उससे भी बढ़कर, और कौन-सा विशेष आनन्द ही रहा, जिसे तुम दोगे ? क्योंकि सुधा- कर चन्द्रमा-अपनी सुधा से, जनता के नयनों को जुड़ाने ( आनन्द देने ) के अतिरिक्त-और क्या कर सकता है ? ॥५८॥ मनस्तु यं नोज्झति जातु, यातु मनोरथः कण्ठपथं कथं सः । का नाम बाला द्विजराजपाणि-ग्रहाभिलाषं कथयेदभिज्ञा ॥५९॥ अथ सर्वथा मनोरथः कथनीयः इत्यभिप्रेत्य, तन्न शक्यमित्याह-मनस्त्विति । मनः = मच्चित्तं कर्तृ यं = मनोरथं जातु = कदापि नोज्झति = न जहाति । स मनोरथः कण्ठपथं = वाग्विषयं, उपकण्ठदेशं च; कथं यातु ? सम्भावनायां लोट् । सम्भावनापि नास्तीत्यर्थः । केनापि प्रतिबध्दस्य मनोरथस्य कथमन्तिकेऽपि सञ्चार इति भावः । कुतः ? अभिज्ञा = विवेकिनी, का नाम बाला = का वा स्त्री [ द्विजराज-पाणि-ग्रहाभिलाषं ] द्विजराजस्य इन्दोः, पाणिना ग्रहे ग्रहणे, अभिलाषं कथयेत् । तथा द्विज ! = पक्षिन् !, राजपाणिग्रहाभिलाषं = नल- पाणिग्रहणेच्छामिति च गम्यते । तथा च दुर्लभजनप्रार्थना द्विजराजपाणिग्रहणकल्पा परिहासास्पदीभूता, कथं लज्जावत्या वक्तुं शक्या इत्यर्थः । पूर्व एवालङ्कारः ॥५९॥ जिस मनोरथ को, मन अपने से कभी अलग नहीं करना चाहता, उस मनो- भाव को ( मन से अलग करके ) कण्ठरूपी मार्ग तक ( लज्जा के कारण ) कैसे ले आऊँ ? ( पृथ्वीतल पर रहनेवाली ) कौन ऐसी विवेकिनी ( समझदार ) बाला है, जो ( आकाश में विराजमान ) द्विजराज ( चन्द्रमा ) को पाणि ( हाथ ) से ग्रहण करने ( पकड़ने की ) अभिलाषा को मुँह से कह सकें ? ( यदि भूतल पर रहनेवाली बालिका, आकाश में रहनेवाले चन्द्र को, अपने हाथ से पकड़ने की इच्छा करे और किसी से यह बात कहे तो उसका यह प्रयत्न एकदम उपहासास्पद तथा असम्भव माना जायगा ) उसी प्रकार ( प्रौढा नायिका की बात छोड़ दीजिए) कौन ऐसी बुद्धिमती बाला है-जो हे द्विज ( हंस ) ! राजा ( नल ) के साथ पाणिग्रहण की अभिलाषा को, मुँह खोलकर, कह सके ? ॥ ५६ ॥