नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)
Naishadhiya Charitam of Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष / पं. शिवदत्त शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसर्गः ३ ] | जीवातु-मदयन्तिकासहितम् । १५७ हैरान किया तथापि ) मुझ-अपराधिनी-को पुरस्कृत ( सौन्दर्य, गुण शील आदि की प्रशंसा) करके, तुम्हारी आत्मा (चित्त) में मेरा अपराध उसी प्रकार प्रति- बिम्बित हो रहा है (अर्थात् मेरे अपराध को अपना अपराध समझकर, क्षमा करा रहे हो) जैसे स्वच्छ (निर्मल) आदर्श (दर्पण) में जो आत्मा (आकृति) पुरस्कृत (सामने खड़ी) हो, उसी का प्रतिबिम्ब (पर्रिछाई) दिखाई पड़ता है (तुम स्वच्छ हृदय हो, इसलिए तुम्हें सभी प्राणी पूजनीय दिखलाई पड़ रहे हैं) ॥ अनार्यमप्याचरितं कुमार्या भवन्मम क्षाम्यतु सौम्य ! तावत् । हंसोऽपि देवांशतयाभिवन्द्यः श्रीवत्सलक्ष्मैव हि मत्स्यमूर्तिः ॥५७॥ अनार्यमिति । हे सौम्य ! = साधो ! भवान् कुमार्याः = शिशोर्मम सम्बन्धि अनार्यमप्याचरितं = त्वदुपद्रवरूपं दुश्चेष्टितं तावत् = प्रथमं क्षाम्यतु = सहतां । हंसोऽपि = तिर्यगपीत्यर्थः । त्वमिति शेषः । भवानित्यनुषङ्गे असीति मध्यमपुरुषाप्रयोगात् । देवांशतया मत्स्यमूर्तिः श्रीवत्सलक्ष्मा=विष्णुः इव अभि- वन्द्यः=वन्द्योऽसि ॥५७॥ हे सौम्य ! तुम मुझ कुमारी कन्या के (तुम्हें तङ्ग करने वाले) अनार्योचित (अर्थात् अनुचित) आचरण को, पहले क्षमा कर दो । (यदि कहो कि तुम राजकुमारी हो, किसी के अपराध को क्षमा कर देना या दण्ड देना राजपरिवार के अधीन होता है और मुझ जैसे साधारण पक्षी से क्यों क्षमा माँग रही हो, तो इसका उत्तर यह है कि ) हंस पक्षी होने पर भी, तुम देवताओं के अंश से उत्पन्न होने के कारण, मत्स्य रूप धारण करने वाले, श्रीवत्स लाञ्छन-धारी विष्णु भगवान् के समान पूजनीय हो (जिस प्रकार भगवान् की मत्स्य मूर्ति की पूजा होती है। उसी प्रकार तुम्हारी देवांश हंस मूर्ति भी पूजनीय है ) ॥५७॥ मत्प्रीतिमाधित्ससि कां त्वदीक्षामुदं मदक्ष्णोरपि यातिशेताम् । निजामृतैर्लोचनसेचनाडुवा पृथक्किमिन्दुः सृजति प्रजानाम् ॥५८॥ अथ यदुक्तं 'त्वयेप्सितं किं विधेहि अभिधेहि' इति तत्रोत्तरमाह-मत्प्रीति- मिति । कां मत्प्रीतिं = किंवा मदीप्सितमित्यर्थः । आधित्ससि = आधातुं कर्त्तु- मिच्छसि । दधातेः सन्नन्ताल्लट् । या = प्रीतिर्मदक्ष्णोः त्वदीक्षामुदं = त्वदीक्षण- प्रीतिम् अपि अतिशेताम् = अतिलंघताम्, त्वद्दर्शनोत्सवादन्यत् किं ममेप्सित- मित्यर्थः । तथाहि--इन्दुः प्रजानां = जनानां लोचनसेचनातू पृथक्