नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)
Naishadhiya Charitam of Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष / पं. शिवदत्त शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंर्गः ३ ] जीवातू-मदयन्तिकासहितम् । १६३ Digitized by Sarayu Trust Foundation and eGangotri उस पक्षी के ( हंस ) के इस प्रकार कहने पर, ( नल के सम्बन्ध में कहते ए संकोच के कारण ) लज्जित तथा ( हंस द्वारा अपनी अभीष्ट पूर्ति के बारे में ल लेने से ) हर्षित हो, दमयन्ती बोली- (तुमने जो लङ्का और अन्य दुर्लभ स्तु के बारे में कहा, सो ) ( चेतो न लंकामयते मदीयं ) मेरा चित्त लङ्का को नहीं चाहता और न किसी अन्य वस्तु की अभिलाषा करता है। ( दूसरा अर्थ- चेतो नलं कामयते मदीयं' = मेरा चित्त नल को चाहता है। तीसरा अर्थ- चेतोऽनलं कामयते मदीयं न' = मेरा चित्त अ-नल 'नल के अतिरिक्त' नहीं चाहता है। चौथा अर्थ- 'चेतोऽनलं कामयते मदीयं' = यदि नल नहीं मिले तो मेरा चित्त अनल 'अग्नि' को चाहेगा; अग्नि की लपट में अपने शरीर की आहुति चढ़ा दूंगी, पर किसी अन्य पुरुष की अभिलाषा नहीं करूँगी ) ॥६७॥ विचिन्त्य बालाजनशीलशैलं लज्जानदोमज्जदनङ्गनागम् । आचष्ट विस्पष्टमभाषमाणांमेनां स चक्राङ्ग-पतङ्ग-शक्रः ॥६८॥ विचिन्त्येति । विस्पष्टमभाषमाणां = श्लेषोक्तिवशात् संदिग्धमेव भाषमाणा- मित्यर्थः । एनां = दमयन्तीं, सः चक्राङ्गपतङ्गशक्रः = हंसपक्षिश्रेष्ठः, [ बाला- जन-शील-शैलं ] बालाजनस्य मुग्धाङ्गनाजनस्य, शीलं स्वभावमेव शैलं [ लज्जा- नदी-मज्जदनङ्ग-नागं ] लज्जायामेव नद्यां, मज्जदनङ्गनागो यस्य तं, विचिन्त्य = विचार्य आचष्ट । तस्य लज्जाविजितमन्मथत्वं ज्ञात्वा लज्जाविसर्जनार्थं वाक्यमुवा- चेत्यर्थः ॥६८॥ मुग्धा ( दमयन्ती रूप अल्हड़ ) नायिका के शील-स्वभाव रूपी पर्वत पर, लज्जा रूपी नदी में, अनङ्ग-नाग ( कामदेव रूपी मत्त गजराज ) को स्नान करते हुए, विचार ( देख ) कर, हंस पक्षियों में इन्द्र के समान वह राजहंस- ( 'श्लेष' एवं 'ध्वनि' द्वारा गूढ वाक्य बोलने वाली; किन्तु ) स्पष्टरूप से अपनी अभिलाषा व्यक्त न करने वाली दमयन्ती से-कहने लगा ॥६८॥ नृपेण पाणिग्रहणे स्पृहेति नलं मनः कामयते ममेति । व्याश्लेषि न श्लेषकवेर्भवत्याः श्लोकद्वयार्थः 'सुधिया मया किम् ॥६९॥ नृपेणेति । श्लेषकवेः = श्लेषभङ्ग्या कवयित्र्याः श्लिष्टशब्दप्रयोक्त्र्या इत्यर्थः । 'कविवर्णने' इति धातोरौणादिक इकारप्रत्ययः । भवत्याः = तव सम्बन्धि नृपेण कर्त्रा, [ पाणिग्रहणस्पृहा ] पाणिग्रहणं पाणिपीडनं । 'उभयप्राप्तौ कर्मणि' इति