नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)
Naishadhiya Charitam of Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष / पं. शिवदत्त शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६८ नैषधचरितम् । [ तृतीयः सर्वदा सर्वतोऽनलेनात्मानं कश्चित् क्वचिद्वेदयेत् ॥' इति वचनात् । अनलं संश्रयिष्ये इत्यनुषङ्गः । नृपतौ = नले विषये, त्वां मृषा गिरं = असत्यवाचं कर्तुं न । अनल एव शरणं, अन्यथा मरणमेव शरणमिति भावः ॥ ७७ ॥ तुमने यह सम्भावना ठीक ही की कि मैं ('निजेच्छया वा०' ७२ वाँ श्लोक) स्वेच्छा से अ-नल (नल के अतिरिक्त अन्य) के साथ विवाह करूँगी ! (अहा हा ! क्या पूछने की बात है ? अर्थात् नल को छोड़कर अन्य के साथ पाणिग्रहण न करूंगी। यदि तुम पूछो कि नल न मिले तो क्या करोगी ? इसका उत्तर यह है कि) उन (नल) के बिना (अर्थात् पति रूप से न मिलने पर), अपनी आत्मा पर आघात (अर्थात् आत्महत्या) करने के अभिप्राय से, अनल (अग्नि) को वरण करूँगी; परन्तु राजा नल के सामने तुम्हें असत्यवादी बनाने के निमित्त, कभी भी अ-नल (नल के अतिरिक्त अन्य युवक) को वरण न करूंगी (यह मेरा दृढ़ निश्चय है) ॥७७॥ मद्विप्रलम्भ्यं पुनराह यस्त्वां तर्कः स किं तत्फलवाचि मूकः ? । अशक्यशङ्क्यव्यभिचारहेतुर्वाणी न वेदा यदि सन्तु के तु ? ॥ ७८ ॥ मदिति । किञ्च यस्तर्कः = ऊहः, पुनः त्वां मद्विप्रलम्भ्यं = मया विप्रल- म्भनीयम् । 'पोरदुपधात्' इति यत्प्रत्ययः । आह = बोधयतीत्यर्थः । स तर्कः [ तत्फ- लवाचि ] तस्य विप्रलम्भस्य, फलवाचि प्रयोजनाभिधाने, मूकः = अशक्तः किं । अतो मय्यसत्यवादित्वशङ्का न कार्येत्यर्थः । कथमेतावता सत्यवाक्यत्वनिश्चय अत आह- [ अशक्यशङ्कव्यभिचारहेतुः ] अशक्या शङ्का यस्य सः अशक्यशङ्कः शङ्कितुमशक्यः, व्यभिचारहेतुर्विप्रलिप्सालक्षणो यस्याः सा वाणी, न वेदा यदि = न प्रमाणं चेत्तर्हि के तु वेदाः सन्तु = न केऽपीत्यर्थः । सम्भावनायां लोट् । वेद- वाचामसत्यत्वे मद्वचोऽप्यसत्यत्वं नान्यथेति भावः ॥ ७८ ॥ जो तर्क (जैसे कोई मुँह से बोले उस तरह) तुम्हें बतलाता है कि तुम मेरे द्वारा छले जा रहे हो, वह (तर्क) उस छल के फल के कथन में क्यों गूँगा बन गया है (अर्थात् वह स्पष्ट रूप से क्यों नहीं कह देता कि तुम मेरे द्वारा छले नहीं जा रहे हो । अब यदि पूछो कि तुम्हारी बात कैसे सत्य मान ली जाय, तो इसका उत्तर यह है कि) जिस में असत्यता की सम्भावना करने का समावेश न हो, वह उक्ति यदि वेद (के समान प्रामाणिक) नहीं है, तो फिर वेद किसे कहेंगे?॥