भारतकोश
नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)

नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)

Naishadhiya Charitam of Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष / पं. शिवदत्त शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished226 पृष्ठ

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सर्गः ३ ] जीवातु-मदयन्तिकासहितम् १७३ दत्त्वापि, शुध्यामि = आनृण्यं गमिष्यामीत्यर्थः। किंतु [जीवाधिकदे] जीवा- धिकः प्रियः तद्वै त्वयि केन शुध्यामि, न केनापि तत्तुल्यदेय-वस्त्वभावादित्यर्थः। सम्प्रति प्राणैः समं तु न किञ्चिदस्तीति भावः। तत् = तस्मादभावादेव मां त्वदृणेषु विषये अशोध्यं = अनृणग्रस्तां भवितुमेव। [अमुद्र-दारिद्र्य-समुद्र-मग्नाम् ] अमुद्रे अपरिमिते, दारिद्र्यं त्वद्देयवस्त्वभावरूपं, तस्मिन्नेव समुद्रे, मग्नां विधेहि । नलसङ्घटनेन मामृणग्रस्तां कुर्वित्यर्थः। अशोध्यं, मग्नामिति मग्नत्वानुवादेन अशुद्धिर्विधीयते। दरिद्राणामृणमुक्तिर्नास्तीति भावः ॥ ८६ ॥ जीवन (प्राण) दान देने वाले तुम्हें, अपना जीवन देकर, मैं ऋण चुका दूंगी (अर्थात् अपनी आत्मा को जीवन पर्यन्त, तुम्हें दान स्वरूप में देकर, मैं उऋण हो जाऊँगी); किन्तु यदि जीवन से भी अधिक बढ़कर (जीवन-धन नल को) दोगे, तब भला मैं कैसे ऋण चुका सकूँगी ? (क्योंकि एक नारी के लिए इस संसार में प्राणाधिक प्रिय पति से भी बढ़कर, कोई दूसरा अमूल्य पदार्थ होता ही नहीं, जिसके बदले में तत्तुल्य कोई पदार्थ देकर, बदला चुकाया जा सके)। अतः मुझे (जीवन-धन-नल-दान देकर) अपना ऋण चुकाने के लिए, ऐसी बना दो कि मैं दरिद्रता के असीम सागर में (सर्वदा के लिए) डूबी (अर्थात् चिरकृतज्ञ बनी) रहूँ ॥ ८६ ॥ क्रीणीष्व मज्जीवितमेव पण्यमन्यं न चेदस्तु तदस्तु पुण्यम् । जीवेशदातर्यदि ते न दातुं यशोऽपि तावत्प्रभवामि गातुम् ॥८७॥ क्रीणीष्वेति। हे जीवेशदातः = प्राणेश्वरद ! मज्जीवितमेव पण्यं = क्रयं वस्तु क्रीणीष्व = जीवेशरूपमूल्यदानेन स्वीकुरुष्वेत्यर्थः। अन्यत् = एतन्मू- ल्यानुरूपं वस्त्वन्तरं नास्ति चेत् तत् = तर्हि पुण्यं = सुकृतमस्तु अपि। किंचिद्यदि ते = तुभ्यं दातुं न प्रभवामि = न शक्नोमि तावत् = तर्हि यशः = कीर्तिं गातुं प्रभवामि । ख्यातिसुकृतार्थमेवोपकुरुष्वेत्यर्थः ॥८७॥ मेरे जीवनरूप पण्य (बिक्री के सौदे) को (प्रियतम-दानरूपी विनिमय से) खरीद लो। इससे यदि कोई लौकिक फल न हो (प्रत्यक्षरूप से देखने में न आवे) तो (कम से कम पारलौकिक) पुण्य तो होगा ही। हे प्राणनाथ-प्रदान-कर्ता ! यद्यपि मैं तुम्हें और कुछ (प्राणनाथ-तुल्य मूल्य हाथों से) देने में समर्थ न हो सकूँ तथापि (मौखिक रूप से) तुम्हारी कीर्ति तो बखान करती रहूँगी ॥८७॥