भारतकोश
नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)

नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)

Naishadhiya Charitam of Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष / पं. शिवदत्त शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished226 पृष्ठ

पृष्ठ 195, कुल 226 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 195

सर्गः ३ ] जीवातु-मद्यन्तिकासहितम् १७९ शृण्वतां चेतसि चकास्तु । किं तु [तद्दोषतायां] तस्य लज्जात्यागस्य अदोष- तायां, स्मरः साक्षी = प्रमाणं, यः = स्मरः तां = भैमीम्, उन्माद्य = उन्मादा- वस्थां प्राप्य, तत्तत् = अनुचितं वचनम् अबीवदत् = वादयतिस्म । वदतेर्णौ चङि 'गति-बुद्धि' इत्यादिना वदेरणि कर्तुः कर्मत्वम् । प्रकृतिस्थस्यायं दोषो न कामोपहत- चेतस इति भावः ॥६७॥ इस प्रकार (प्रगल्भा नायिका के समान निर्लज हो) कहने वाली दमयन्ती का साथ जो लज्जा ने छोड़ दिया-वह (लज्जात्याग लक्षण युक्त) अनौचित्य तो हमारे (जैसे धृष्ट कवियों आदि के) चित्त में विराजमान हुआ। पर, कामदेव तो -उस दमयन्ती की लज्जा परित्याग रूप निर्दोषता का-साक्षी (साक्षात् अपनी आँखों से देखने वाला) हुआ; जिस (काम) ने उस (दमयन्ती) को उन्मत्त (काम-विकल) करके, उसके मुँह से वैसा-वैसा कहलवाया ॥६७॥ उन्मत्तमासाद्य हरः स्मरश्च द्वावप्यसीमा मुदमुद्वहेते । पूर्वः स्मरस्पर्धितया प्रसूनं नूनं द्वितीयो विरहाधिदूर्नम् ॥६८॥ ननु कामो वा किमर्थमेवं कारयतीत्याशङ्क्य, तस्यायं निसर्गो यदुन्मत्तेन क्रीड- तीति सहृष्टान्तमाह - उन्मत्तमिति । हरः स्मरश्च द्वावपि, उन्मत्तमासाद्य नूनं असीमां = दुरन्तां मुदम् उद्वहेते = दधतुः । वहे स्वरितेत्वादात्मनेपदं । किन्तु, तत्र निर्देशक्रमात् । पूर्वः = हरः स्मरस्पर्धितया = स्मरद्वेषितया, प्रसूनं = धुत्तूर- कुसुमं, तस्यायुधतयेति भावः । अन्यत्र द्वितीयः = स्मरस्तु विरहाधिदूर्न = विरह- व्यथादुस्थमुन्मादावस्थापन्नमित्यर्थः । अन्यत्र विनोडलाभादित्यर्थः । 'उन्मत्त उन्मा- दवति धुत्तूर-मुचुकुन्दयोः' इति विश्वः । उभयोरभेदाध्यवसात् समानधर्मत्वविशेषण- मात्रश्लेषात् प्रकृताप्रकृतगोचरत्वाच्च उभयश्लेषः । तेन हरवत् स्मरोऽप्युन्मत्तप्रिय इति उपमा गम्यते ॥६८॥ कामारि महादेव जी और शङ्करारि कामदेव-ये दोनों ही 'उन्मत्त' को पाकर यह निश्चित है कि असीम आनन्द को प्राप्त होते हैं। पूर्व (अर्थात् शिवजी) को (अपने शत्रु पुष्पायुध के अस्त्र) पुष्प (धतूरे के फूल) रूप उन्मत्त पदार्थ को पाकर, असीम हर्ष होता है; क्योंकि उन्हें अपने शत्रु कामदेव के प्रति स्पर्द्धा है। दूसरे (अर्थात् कामदेव) को विरह-आधि (वियोगजन्य मानसिक क्लेश) से सन्तप्त उन्मत्त (उन्मादावस्था में निमग्न नायिका) को पाकर, परम प्रमोद