भारतकोश
नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)

नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)

Naishadhiya Charitam of Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष / पं. शिवदत्त शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished226 पृष्ठ

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१८८ नैषधचरितम् । [ तृतीयः जो नाड़ी, नेत्र, मुख, जिह्वा आदि की परीक्षा की, शरीर का पीलापन देखा तो उनको काम-ज्वर से पीडित पाया । किन्तु भारत-नरेश के सम्मुख लज्जा के कारण वे मूल रोग को नहीं बता सके । इस पर हमारे कवि उपर्युक्त उत्प्रेक्षा करते हैं कि नल की लज्जा, छुतही बीमारी की तरह, वैद्यों को लग गयी ] ॥१११॥ बिभेति रुष्टासि किलेत्यकस्मात् स त्वां किलोपेत्य हसत्यकाण्डे । यान्तीमिव त्वामनुयात्यहेतोरुक्तस्त्वयेव प्रतिवक्ति मोघम् ॥११२॥ अथ उन्मादावस्थामाह--बिभेतीति । स = नलः, अकस्माद् = अकाण्डे रुष्टा = कुपिता असि, इति बिभेति । अकाण्डे = अनवसरे त्वां उपेत्य किल = प्राप्येव, हसति । अहेतोः अकस्माद्यान्तीं = गच्छन्तीं किल त्वामनुयाति । त्वया युक्त इव मोघं = निर्विषयं प्रतिवक्ति । सर्वोऽप्ययमुन्मादानुभावः । 'उन्मादश्चित्तविभ्रमः' इत्यमरः ॥११२॥ [ उन्माददशा का वर्णन-- ] ( हे दमयन्ती ! ) आप रुष्ट हो गयी हैं-ऐसा आपको प्रणयकुपिता अनुमान कर, वे नल एकाएक काँप उठते हैं । आप उन्हें मिल गयी हैं-ऐसी सम्भावना करके, वे अनवसर ही खिलखिला कर हँस पड़ते हैं। आप मानों चली जा रही हैं-ऐसा समझ कर, अकारण ही आपके पीछे- पीछे चलने लगते हैं। मानों आपने उन्हें सम्बोधित करके, कुछ कहा है-ऐसा जानकर, वे वृथा ही आपको प्रत्युत्तर देने लगते हैं ॥११२॥ भवद्वियोगाच्छिदुरार्तिधारा-यमस्वसुर्मज्जति निःशरण्यः । मूर्च्छामयद्वीपमहान्ध्यपङ्के हाहा ! महीभृद्भटकुञ्जरोऽयम् ॥११३॥ अथ मूर्च्छावस्थामाह--भवदिति । [ भवद्वियोगच्छिदुरार्तिधारा-यम- स्वसुः ] भवत्याः वियोगो भवद्वियोगः । सर्वनाम्नो वृत्तिमात्रे पुंवद्भावः । तस्मिञ्- च्छिदुरा अविच्छिन्ना विदिभिदिच्छिदः कुरच् । आर्तिधारा दुःखपरम्परा, तस्या एव यमस्वसुः = यमुनायाः । [ मूर्च्छामयद्वीपमहान्ध्यपङ्के ] मूर्च्छामयं मूर्च्छा- वस्थारूपं यद्द्दीपं, तत्र यन्महान्ध्यं महामोहः, तस्मिन्नेव पङ्के अयं [ महीभृद्भट- कुञ्जरः ] महीभृद्भटो राजवीरः, स एव कुञ्जरः, निःशरण्यः = निरालम्बः सन् मज्जति । 'हा हा' इति खेदे । रूपकालङ्कारः । आर्तिधारायास्तमोविकारत्वेव रूप- साम्याद्यमुनारूपणम् ॥११३॥ [ मूर्च्छादशा का वर्णन-- ] हाय ! हाय ! अवलम्बन ( आश्रय ) हीन योद्धा