भारतकोश
नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)

नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)

Naishadhiya Charitam of Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष / पं. शिवदत्त शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished226 पृष्ठ

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सर्गः ३ ] जीवातु-मदयन्तिकासहितम् । १९१ नलं त्वाञ्च । 'त्यदादीनि सर्वानित्यम्' इति एकशेषः । योक्तुमिच्छतीति युयुक्षुः युजेः सन्नन्तादुप्रत्ययः । स्वभ्यासं = अभ्यासस्य समृद्धौ, निरन्तराभ्यास इत्यर्थः । समृ- द्धयर्थेऽव्ययीभावः । ततः परस्याः सप्तम्या वैकल्पिकत्वादम्भावः । आस्ते नु = तथाभ्यस्यति किमित्यर्थः । अत्र तादर्थ्ये चतुर्थ्या अम्भाव इति व्याख्याने अभ्यासार्थ- मभ्यस्यतीत्यर्थः स्यात् तदात्माश्रयत्वादित्युपेक्षणीयम् । अत्र दमयन्ती-नलयोरन्योन्यशोभा- जननोक्तेरन्योन्यालङ्कारः । 'परस्परक्रियाजननमन्योन्यम्' इति लक्षणात् । 'उपमाद्व- यानुप्राणित' इति सङ्करः । तन्मूला चेयं विधातुः पुनर्निशाशशियोजनायां दमयन्ती- नलयोजनाभ्यासत्वोत्प्रेक्षेति ॥ ११७ ॥ आप की शोभा नल के साथ ऐसी हो, जैसी निशा-नायिका अपने निशा-नाथ पूर्ण चन्द्र के साथ शोभा पाती है, और नल की शोभा आप के साथ वैसी हो जैसी चन्द्रमा की शोभा रात्रि के साथ होती है। (जिस प्रकार कोई शिल्पकार किसी सुन्दर वस्तु के निर्माण के पूर्व उसका बार-बार अभ्यास करता है, उसी प्रकार) बार-बार रात्रि और चन्द्रमा का जोड़ा मिलाने वाले ब्रह्मा, मालूम पड़ता है कि आप दोनों को दम्पतिरूप में मिलाने के लिए, पूर्वाभ्यास कर रहे हैं क्या ? ॥ स्तनद्वये तन्वि ! परं तवैव पृथौ यदि प्राप्स्यति नैषधस्य । अनल्पवैदग्ध्यविवर्धिनीनां पत्राबलीनां रचना समाप्तिम् ॥ ११८॥ स्तन इति । हे तन्वि ! किञ्च, नैषधस्य = नलस्य, [ अनल्प-वैदग्ध्य- विवर्द्धिनीनां ] अनल्पेन महता, वैदग्ध्येन नैपुण्येन, विवर्धनीनामुज्जृम्भणीनां, पत्राबलीनां, रचना समाप्तिं = सम्पूर्णतां प्राप्स्यति यदि, तर्हि पृथौ = पृथुनि; भाषितपुंस्कत्वाद्विकल्पेन पुंवद्भावः । तवैवै स्तनद्वये परं प्राप्स्यति; नान्य- स्या इत्यर्थः । अन्यस्या अयोग्यत्वादिति भावः ॥११८॥ हे कृशाङ्गी ! महाराज नल के अत्यधिक प्रावीण्य को प्रकट करने वाली, पत्रा- कार चित्र परम्परा की बनावट-यदि कहीं समाप्ति प्राप्त कर सकती है तो एकमात्र आपके विशाल उरोज-युगल में (अर्थात् महाराज नल स्तनों पर पत्रावली की रचना करने में बड़े कुशल हैं; किन्तु उनकी रचनाएं विस्तृत स्थल चाहती हैं, अतएव वे रचनाएँ आपके विशाल दोनों स्तनों पर बहुत अच्छी तरह हो सकती हैं जिन से नल की प्रवीणता सिद्ध होगी । उनकी अन्य रानियों के स्तन अत्यन्त छोटे-छोटे