भारतकोश
नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)

नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)

Naishadhiya Charitam of Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष / पं. शिवदत्त शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished226 पृष्ठ

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सर्गः २] जीवातु-मदयन्तिकासहितम् । १९५ प्रतीच्छतं = स्वीकुरुतम् । युद्धविक्रान्ता हि देवैः पुष्पवृष्ट्या सम्भाव्यन्त इति भावः ॥ १२४ ॥ हे भीम-राजकुमारी ! आप दोनों—युवा तथा युवती—विहार-वाटिका में (पद्मासन, नागपादासन, लता-वेष्टन, विपरीतासन आदि) विविध आसनों से सुरतरूप मल्लयुद्ध द्वारा, अत्यन्त प्रमुदित हुए (शरीर मर्दन के कारण पुष्प-शय्या से उठी हुई सुगन्धि मिश्रित) पवन द्वारा बार-बार उड़ायी गयी पुष्प-वर्षा को स्वीकार करें [अर्थात् जिस प्रकार दो मल्लों को मल्लशाला में मल्लयुद्ध करते देखकर, उनके धोबीपाट-घिस्सा-लपेटन-कमरतोड़ आदि विविध दाँव पेचों से प्रसन्न होकर, दर्शकगण उन पर पुष्प-वृष्टि करते हैं उसी प्रकार आप दोनों कामक्रीडा के अखाड़े में, कामशास्त्र में वर्णित विविध आसनों द्वारा पवनदेव को प्रसन्न करें जिससे वे राजकीय उद्यान के पुष्पों द्वारा आप लोगों का अभिनन्दन करें] ॥ १२४॥ अन्योन्यसङ्गमवशादधुना विभातां तस्यापि तेऽपि मनसी विकसद्विलासे। स्रष्टुं पुनर्मनसिजस्य तनुं प्रवृत्तमादाविव द्व्यणुककृत् परमाणुयुग्मम् १२५ अन्योन्येति । किं च, अधुना अन्योन्यसङ्गमवशात् विकसद्विलासे = वर्धमानोल्लासे, तस्यापि तेऽपि = नलस्य तव च, मनसी मनसिजस्य = कामस्य, तनु = शरीरं, पुनः स्रष्टुम् = आरब्धुं प्रवृत्तमत एवादौ [द्व्यणुककृत् ] द्वाभ्यामारब्धं कार्यं द्व्यणुकं, तत्करोतीति तत्कृत् तदारम्भकं करोतेः क्विप् । तत्पर- माणुयुग्ममिव इत्युत्प्रेक्षा । तार्किकमते मनसोऽणुत्वादिति भावः । विभातां = कार्यारम्भकपरमाणुयुगलवदविश्लेषेण विराजतामित्यर्थः । भातेर्लोट् । तस्येति तसः तामादेशः ॥ १२५ ॥ इस समय परस्पर (शारीरिक) सङ्गम होने के कारण, काम-विलास विकसित हो, उन नल के एवं आपके मनो-द्वय में (मनसिज) कामदेव का शरीर फिर मूर्ति- मान् होने के लिए प्रवृत्त हो, जिस प्रकार आरम्भ में दो परमाणु द्व्यणुक उत्पन्न करते हैं [अर्थात् नैयायिकों एवं वैशेषिक मतवादियों के कथनानुसार जिस प्रकार आरम्भ में परमात्मा की इच्छा से परमाणु मिलकर, द्व्यणुक उत्पन्न करते हैं और फिर क्रमशः सृष्टि की रचना होती है, उसी प्रकार महादेव जी के तीसरे नयन की ज्वाला में भस्म हुए कामदेव को पुनर्जीवित करने के लिए, आप दोनों के परस्पर