भारतकोश
नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)

नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)

Naishadhiya Charitam of Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष / पं. शिवदत्त शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished226 पृष्ठ

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१९६ नैषधचरितम् [तृतीयः अनुराग करने वाले, दो परमाणु-तुल्य मन उपक्रम कर रहे हैं। अतः द्व्यणुक-तुल्य 'मनसिज' का प्रादुर्भाव सम्भव है ] ॥१२५॥ कामः कौसुम-चाप-दुर्जयममुं जेतुं नृपं त्वां धनु- र्वल्ली मव्रणवंशजामधिगुणामासाद्य माद्यत्यसौ । ग्रीवालङ्कृति-पट्टसूत्रलतया पृष्ठे कियलम्बया भ्राजिष्णुं कषरेखयेव निवसतसिन्दूरसौन्दर्यया ॥१२६॥ काम इति । असौ, यो नलजिगीषुरिति भावः । कामः, [कौसुम-चाप- दुर्जयं ] कौसुमेन चापेन दुर्जयं, जितेन्द्रियत्वादिति भावः । अमुं नृपं = नलं जेतुम् अव्रणवंशजां = सत्कुलप्रसूतां, दृढवेणुजन्यां च। 'द्वौ वंशौ कुलमस्करौ' इति अमरः । अधिगुणाम् = अधिकलावण्यादिगुणाम्, अधिज्वां च। [निवसत्सि- न्दूरसौन्दर्यया] निवसदनुवर्तमानं सिन्दूरस्याङ्कुरावस्थायां नालान्तराले क्षिप्तस्य, सौन्दर्यं शोभा यस्यां तया, कषरेखया = कालन्तरे सिन्दूरसंक्रान्तिपरीक्षार्थं कृत- घर्षणरेखया इव इत्युत्प्रेक्षा । पृष्ठे = ग्रीवापश्चाद्भागे, कियत् किञ्चिद्यथा तथा, लम्बया स्रस्तया, [ग्रीवालङ्कृतिपट्टसूत्रलतया ] ग्रीवालङ्कृतिः ग्रीवाल- ङ्कारभूता, या पट्टसूत्रलता, तया, भ्राजिष्णुं ताच्छील्ये भ्राजमानां 'भुवश्च' इति चकारादिष्णुच्। त्वामेव धनुर्वल्लीं चापलताम्, आसाद्य, माद्यति = हृष्यति । श्लेषोत्प्रेक्षासङ्कीर्णो रूपकालङ्कारः ॥ १२६ ॥ यह कामदेव, अपने (प्राचीन अस्त्र) कुसुम-धनुष द्वारा, उन राजा नल का जीतना दुष्कर समझ कर, उन्हें जीतने के अभिप्राय से-निर्दोष वंश में उत्पन्न हुई, (शील सौन्दर्य आदि) अतिशय गुणवती, पीठ पर कुछ-कुछ लटकने वाली, लाल-लाल सिन्दूर के सौन्दर्य से मनोहारिणी, कसौटी की सुवर्ण रेखा के समान प्रकाशमान, ग्रीवा की अलङ्काररूपी पट्ट-सूत्र- लता द्वारा शोभाशालिनी--आप जैसी (अर्थात् दमयन्तीरूप) धनुष-लता को पाकर, प्रसन्नता के मारे फूला अङ्ग नहीं समा रहा है (कि अब तो मेरा लक्ष्य बच कर कहीं नहीं जा सकता)। [जिस प्रकार कोई धनुर्धारी अव्रण अर्थात् बिना घुने हुए, अच्छे बाँस को लेकर, उसका धनुष बना कर, उस पर अधिगुण अर्थात् प्रत्यंचा चढ़ा कर, उसके पृष्ठ भाग पर, सिन्दूर रगड़ कर धनुष की परीक्षा करता है (यदि बाँस पर सिन्दूर लकीर की तरह पड़ जाता है तो वह उत्कृष्ट कोटि का धनुष माना जाता है) उसी प्रकार