भारतकोश
नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)

नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)

Naishadhiya Charitam of Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष / पं. शिवदत्त शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished226 पृष्ठ

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सर्गः ३ ] जीवातु-मदयन्तिकासहितम् । १९९ कारण अपने जीवन को व्यर्थ समझ कर, आपके केश-कलाप में, अपने पुष्परूपी बाणों को फेंक दिया (अर्थात् आपके शिर के बालों में गूँथे गये फूल ही कामदेव के पुष्प-बाण हैं, जिनके दर्शन मात्र से कामोद्दीपन होता है) । आप के ललाट के निचले भाग अर्थात् भौहों में उसने अपने धनुष को फेंक दिया (अर्थात् आप की भौंह कामदेव की धनुष है—जिस के देखने से कामोद्दीपन होता है) और अपने शरीर को उसने भट्टी के समान महादेव जी के नेत्र में झोंक दिया। अब उसने वितनु (अनङ्ग) होकर, उन नल को जीतने के अभिप्राय से तप करने के हेतु, आप के शरीररूपी तपोवन में आश्रय लिया है। आप के युगल स्तनरूपी पर्वत (के उत्तुङ्ग शिखर) पर, रची हुई पत्रावली ही (कामोद्दीपन होने के कारण) उसकी पर्णशाला हो रही है। [जिस प्रकार कोई योद्धा अपने शत्रु से पराजित होकर, अपने समूचे हथियार डालकर, ग्लानि के कारण, अपने शरीर को अग्नि से सन्तप्त कर, वैरी-विजय के लिए, पर्वत पर जाकर, पत्तों की कुटिया बनाकर, दुष्कर तप करता है; उसी प्रकार कामदेव ने भी आप के स्तन-शैल पर जाकर पत्रावली रूपी पत्तों की कुटिया में आश्रय बना कर, तप करना आरम्भ कर दिया है]॥१२८॥ इत्यालपत्यथ पतत्रिणि तत्र भैमीं सख्यश्चिरात्तदनुसन्धिपराः परीयुः। शर्मास्तु ते विसृज मामिति सोऽप्युदीर्य वेगाज्जगाम निषधाधिपराजधानीम् ॥१२९॥ इतीति । तत्र = तस्मिन्, पतत्रिणि = हंसे भैमीम् इति = इत्थम् आलपति = भाषमाणे सति, अथ = अस्मिन्नवसरे, चिरात्प्रभृति, [ तदनुसन्धि- पराः ] तस्या भैम्याः, अनुसन्धिborder अन्वेषणम्। 'उपसर्गे घोः किः'इति किः। तत्पराः सख्यः, परीयुः=परिवव्रुः । इणो लिट् । अथ स=हंसोऽपि ते=तव, शर्मास्तु= सुखमस्तु, मां विसृज इत्युदीर्य वेगात्रिषधाधिपराजधानीं जगाम ॥१२६॥ उस पक्षिराज हंस के उपर्युक्त बातों के कह चुकने के बाद, दमयन्ती को बहुत देर से ढूँढ़ने में लगी हुई सहेलियों ने, वहाँ जाकर, उसे घेर लिया । तब (उन्हें आती हुई देखकर) वह हंस भी-'आप सुखी रहें और मुझे विदा दें'-ऐसा कह, बड़ी तेजी के साथ, नैषधनगर की ओर उड़ गया ॥ १२६ ॥