नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)
Naishadhiya Charitam of Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष / पं. शिवदत्त शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसर्गः १ ] जीवातु-मदयन्तिकासहितम् । ४३ जिस में फल अधिक आने के लिए धूप दी जाती थी-ऐसे अनार के पेड़ में नल ने फल लगे हुए देखे । जो ऐसे प्रतीत होते थे मानों विदर्भकुमारी दम- यन्ती के स्तनों का औन्नत्य प्राप्त करने के लिए, धुँआ पीकर और नीचे की ओर मुँह कर के, घड़े (कलश) तपस्या कर रहे हों ॥ ८२ ॥ वियोगिनीमैक्षत दाडिमीमसौ प्रियस्मृतेः स्पष्टमुदीतकण्टकाम् । फलस्तनस्थानविदीर्णरागिहृद्विशच्छुकास्यस्मरकिंशुकाशुगाम् ॥८३॥ वियोगिनीमिति । असौ=नलः प्रियस्मृतेः=दमयन्तीस्मरणादिव स्पष्टं व्यक्तम् । उदीतेति ईङ्गताविति धातोः कर्त्तरि क्तः । [ उदीतकण्टकम् ] उदीरिताः उद्गताः कण्टकाः स्वावयवसूचय एव कण्टका रोमाञ्चा यस्यास्तामिति श्लिष्टरूपकम् । 'वेणौ- द्रुमाङ्गे रोमाञ्चे क्षुद्रशत्रौ च कण्टकः' इति वैजयन्ती । फलस्तनस्थानविदीर्णरागि- हृद्विशच्छुकास्यस्मरकिंशुकाशुगां = फलान्येव स्तनौ तावेव स्थानं, तत्र विदीर्णो रागो यस्यास्तीति रागि, रक्तवर्णमनुरक्तञ्च, यत्तस्मिन् हृदि, विशत् बीजभक्षणान्तः- प्रविशत् शुकास्यरूपं शुकतुण्डमेव, स्मरस्य किंशुकं पलाशकुङ्मलमेवाशुगो बाणो, यस्यास्तां । दाडिमीमेव वियोगिनीं = विरहिणीम्, ऐक्षत = अपश्यत् । रूपका- लङ्कारः । विः पक्षी, तद्योगिनीमिति च गम्यते ॥ ८३ ॥ जिस प्रकार वियोगिनी नायिका अपने प्रियतम की सुधि कर के, रोमाञ्चित हो जाती है और उससे स्तनस्थल के बीच में चुभने का अनुभव करती है, उधर कामदेव रागि (अनुरक्त) हृदय में लाल टेसू के बाण से विदीर्ण करता है ; उसी प्रकार नल ने (वियोगिनी नायिका की भाँति दाडिमी (अनारप्रेयसी) को देखा- जिसके शरीर कण्टकित थे ( मानो अपने प्रियतम की सुधि कर के रोमाञ्चित हो रही हो), जिस के गोल आकार मानो उरोज थे, जिस के रागि (प्रियतम पर अनुरक्त) हृदय (भीतर के लाल-लाल दाने) को सुग्गे अपनी चोंच से विदीर्ण कर रहे थे (मानो कामदेव ने अपने टेसू के बाणों से उसे विदीर्ण किया हो) ॥८३॥ स्मरार्द्धचन्द्रेषुनिभे कृशीयसां स्फुटं पलाशोऽध्वजुषां पलाशनात् । स बृन्तमालोकत् खण्डमन्वितं वियोगिहृत्खण्डिनि कालखण्डजम्॥८४॥ स्मरार्द्धेति । स = नलः [स्मरार्द्धचन्द्रेषुनिभे] स्मरस्य योऽर्द्धचन्द्रः, अर्द्ध- चन्द्राकार इषुस्तन्निभे तत्सदृशे, नित्यसमासत्वादस्वपदविग्रहः । अत एवामरः- 'स्युरुत्तरपदे त्वमी-निभ-सङ्काश-नीकाश-प्रतीकाशोपमादयः' इति । [ वियोगि-