भारतकोश
नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)

नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)

Naishadhiya Charitam of Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष / पं. शिवदत्त शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished226 पृष्ठ

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६६ नैषधचरितम् । [ प्रथमः आपके (लोभाविष्ट) चित्त को धिक्कार है। जैसे बरफ के टुकड़े (बनौरी गिरने) से, सागर के जल की वृद्धि नहीं होती, उसी तरह इन कतिपय (चन्द सोने के पङ्खों) से आपकी राजलक्ष्मी की कितनी वृद्धि होगी ? ॥१३०॥ न केवलं प्राणिबधो बधो मम त्वदीक्षणाद्विश्वसितान्तरात्मनः । विगर्हितं धर्मधनैर्निबर्हणं विशिष्य विश्वासजुषां द्विषामपि ॥१३१॥ नेति । हे नृप ! त्वदीक्षणात्=त्वन्मूर्त्तिदर्शनादेव, विश्वसितान्तरात्मनः= विस्रब्धचित्तस्य, विश्वस्तस्येत्यर्थः । मम बधः केवलं प्राणिमात्रबधो न, किन्तु विश्वासघातपातक मित्यर्थः । ततः किमत आह-विश्वासजुषां = विस्रम्भभाजां द्विषामपि निबर्हणं = हिंसनं धर्मधनैः = धर्मपरैः मन्वादिभिः, विशिष्य = अति- रिच्य विगर्हितम् = अत्यन्तनिन्दितमित्यर्थः ॥१३१॥ आपके दर्शन से, मेरे अन्तःकरण में विश्वास उत्पन्न हो गया था (इसी से मैं विश्वस्त हो, सो गया था; इस बीच आपने मुझे पकड़ लिया) अतः मुझ जैसे (निश्छल तथा विश्वास करने वाले साधारण) जीव के बध करने से, न केवल आपको प्राणिवध का पाप लगेगा, बल्कि विश्वासघात का भी पाप लगेगा; क्योंकि धर्मरूपी धन वाले (धर्मपरायण मनु आदि) महर्षियों ने (मित्रों की कौन कहे ?) विश्वास करके आये हुए शत्रुओं के बध करने की भी विशेष रूप से (घोर) निन्दा की है ॥१३१॥ पदे पदे सन्ति भटा रणोद्धटा न तेषु हिंसारस एष पूर्यते ? धिग्वीदृशं ते नृपतेः कुविक्रमं कृपाश्रये यः कृपणे पतत्रिणि ॥१३२॥ पदे पद इति । रणोद्धटाः=रणेषु प्रचण्डाः, भटाः=योधाः, पदे पदे सन्ति= सर्वत्र सन्तीत्यर्थः । वीप्सायां द्विर्भावः । एषः हिंसारसः = हिंसारागः तेषु = भटेषु न पूर्यते । अत्र काकुः-न पूर्यते किमित्यर्थः ? । नृपतेः = महाराजस्य ते = तव ईदृशम्=अवध्यवधरूपं कुविक्रमं =कुत्सितपराक्रमं धिक् यः=कुविक्रमः कृपाश्रये= कृपाविषये अनुकम्पनीये कृपणे = दीने पतत्रिणि क्रियत इति शेषः ॥१३२॥ पग-पग पर (सर्वत्र) रण-मत्त योद्धा भरे पड़े हैं। क्या उनसे आपके हिंसा- रस (हत्या-प्रेम) की पूर्ति नहीं होती ? महाराज के इस प्रकार के (अवध्यरूप) कु-पराक्रम को धिक्कार है—जो मुझ जैसे दीन तथा कृपापात्र पक्षी पर अपनी शूरता प्रकट कर रहे हैं ! ॥१३२॥