नलचम्पू / दमयन्ती-कथा (त्रिविक्रम भट्ट - विषमपदप्रकाश व्याख्या सहित सम्पूर्ण ७ उच्छ्वास)

नलचम्पू / दमयन्ती-कथा (त्रिविक्रम भट्ट - विषमपदप्रकाश व्याख्या सहित सम्पूर्ण ७ उच्छ्वास)
Nala Champu (Damayanti Katha) of Trivikrama Bhatta with Commentary
त्रिविक्रम भट्ट द्वारा
DevanagariHindipublished258 पृष्ठ
पृष्ठ 252, कुल 258 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 252
४ नलचम्पूस्थश्लोकानां·
| उच्छ्वासः | मूलानि | श्लोकसंख्या | उच्छ्वासः | मूलानि | श्लोकसंख्या |
|---|---|---|---|---|---|
| १ | धुतकदम्ब- | ४३ | ३ | प्रभासंयोगिविख्यात- | २४ |
| ६ | धुतरजनि- | ५६ | १ | प्रसन्नाः कान्तिहारिण्यो | ४ |
| १ | नक्षत्रभूः क्षत्र- | ३७ | ६ | प्रसरति रणरणकरसः | ४३ |
| ७ | न गम्यो मन्त्राणां | १७ | ५ | प्रसृतकमलगन्धं | ८ |
| ३ | न तत्काव्यं न तद्भाष्यं | २८ | ७ | प्रस्तुतस्य विरोधेन | ४६ |
| ५ | नद्यास्तीरे विदर्भाया | २७ | ४ | प्रायः सैव भवे- | १ |
| २ | गमिताः फलभारेण | २ | २ | प्रावृषं शरदं | ३ |
| ६ | नलोऽपि मां | १९ | ६ | प्रियविरहविषा- | ४५ |
| १ | नास्ति सा नगरी यत्र | २६ | ५ | प्रेमप्रपञ्च | ११ |
| ५ | निजप्रियमुखभ्रान्त्या | ६० | ५ | वक्रकृतनिनदं | ४१ |
| २ | नित्यमुद्वहते | ३३ | २ | वाणकरवीरदमनक- | १७ |
| ६ | निपतति किल | २० | ५ | बालोन्मील- | ३९ |
| १ | निर्मोसं मुखम- | ४७ | ४ | विभर्ति यो ह्यर्जुन- | १८ |
| ४ | निर्माय स्वयमेव | ७ | ४ | विभ्रते हरिणीं | ३२ |
| १ | निश्चितं ससुरः | १० | १ | ब्रह्मण्योऽपि | ४९ |
| १ | नीरं नीरजनिर्मुक्तं | ४२ | १ | भङ्गश्लेषकथाबन्धं | २२ |
| २ | नीरञ्जनपदे | २९ | ६ | भजत वलसमूहाः | ७५ |
| ६ | नृप चलसि | ६८ | ५ | भवति यदि सहस्रं | १ |
| ७ | नोद्याने न तरङ्गिणी | १६ | ७ | भवति हृदयहारी | ४७ |
| १ | नो नेत्राञ्जलिना | ६२ | १ | भवन्ति फाल्गुने | २७ |
| २ | पटलमलिकुलाना- | ४ | ६ | भानोः सुता | १५ |
| ५ | पद्मान्यातपवारणानि | ७२ | १ | भिन्दन्कन्द- | ४५ |
| ७ | परिम्लानच्छाया | २५ | ७ | मुक्तान्ते धृत- | १३ |
| ३ | परिहरति वयो | २९ | ५ | भूपालामन्त्रणे | २२ |
| १ | पर्णैः कर्णपुटायितै- | ४१ | १ | भूमयो बहिरन्त- | ३१ |
| ६ | पर्वतभेदि पवित्रं | २९ | ३ | भोगान्भो गङ्गवीची- | २२ |
| ५ | पश्यैताः करिकुम्भ- | ३८ | ५ | भ्रमकरं | ६३ |
| २ | पाण्डुपङ्कजसंलीन- | १४ | २ | भ्राम्यद्विरेफाणि | ५ |
| ६ | पीनोन्नमद्धन- | ६४ | ६ | भ्राम्यद्भृङ्गभरा- | ६२ |
| १ | पुनरपि तदभिज्ञा- | ६४ | ५ | मज्जत्कुञ्जर- | ३६ |
| ५ | पूर्वापरपयोराशि- | ३० | ४ | मण्डलीकृतकोदण्डः | ३ |
| ५ | पूर्वाधं विहितोदया | ७४ | ७ | मदनमतियुवानं | २७ |
| ७ | पौष्पाः पञ्चशराः | १८ | ५ | मध्यं त्रिवली | ५७ |