भारतकोश
प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार) द्वारा

DevanagariHindipublished178 पृष्ठ

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भगवान्‌के पवित्र नामोंकी तो चर्चा हुई है। इससे अवश्य ही मेरे नीरस और भक्तिशून्य हृदयमें कुछ रसका और भक्तिका संचार हुआ होगा। एक महात्मा भक्तके इन वचनोंपर हमें दृढ़ विश्वास करना चाहिये कि भगवान्‌के पवित्र नाम-गुणोंके स्मरण और कीर्तनसे मनुष्यका कलुषित हृदय भी क्रमशः पवित्र होकर शिशुकी भाँति सरल हो जाता है। भगवान्‌के गुण और नामोंका कीर्तन हृदयकी सारी कालिमाओंको निःशेषरूपसे धो डालता है और प्रेमावेशके कारण शुद्ध और शान्तिमय दिव्य भावोंकी उत्पत्ति होकर उसके जन्म और जीवनको सफल कर देती है। महापातकयुक्तोऽपि ध्यायन्निमिषमच्युतम्। पुनस्तपस्वी भवति पङ्क्तिपावनपावनः॥ ‘महापातकी व्यक्ति भी यदि निमेषमात्र श्रीभगवान्‌का ध्यान करे तो वह पुनः पवित्र होकर पवित्र करनेवालोंको भी पवित्र कर सकता है।’ फिर इस ग्रन्थमें व्याख्यारूपसे जो कुछ लिखा गया है सो सभी सन्तोंकी जूठन-प्रसादी है। मेरा वस्तुतः इसमें कुछ है भी नहीं। इसलिये पाठकोंको मेरी ओर न देखकर सूत्रकार, सूत्र और सूत्रकी व्याख्यारूपमें लिखे हुए शास्त्रों और सन्तोंके भावोंपर ध्यान देना चाहिये। षड्दर्शनोंकी भाँति भक्तिसूत्र भी एक दर्शन माना गया है। इसे भक्तगण सप्तम दर्शन कहते हैं। ज्ञान-विज्ञानसम्पन्न पुरुष ही वास्तवमें भगवत्प्रेमके प्रकृत अधिकारी होते हैं। देवर्षिने चौरासी सूत्रोंमें ही भक्तितत्त्वकी व्याख्या, भक्तिके अन्तराय, भक्तिके साधन, भक्तिकी महिमा और भक्तोंका महत्त्व भलीभाँति प्रकट कर दिया है। अवश्य ही इसमें भगवान्‌के सगुण साकार दिव्य स्वरूपकी भक्तिका वर्णन है, परन्तु यह नहीं समझना चाहिये कि

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