भारतकोश
प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार) द्वारा

DevanagariHindipublished178 पृष्ठ

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ज्ञानसे इस भक्तिका कोई विरोध है। वरं स्वयं देवर्षिने व्रजगोपियोंका उदाहरण देकर उनके मनमें श्रीभगवान्‌के माहात्म्यका ज्ञान होना सिद्ध किया है। श्रीभगवान्‌का ज्ञान ही न हो तो प्रेम किसमें हो। और यह तत्त्व सत्य ही है कि अभिन्न अखण्ड अनन्य अविकारी प्रेम होनेपर ही हृदयके असली तत्त्वका—प्रियतमके मनकी बातका पता लगता है। अतएव ज्ञान और भक्तिका इसमें कोई विरोध नहीं समझना चाहिये। इसी प्रकार कर्मका भी विरोध नहीं है। भगवान्‌के लिये निष्काम कर्म करनेकी तो आज्ञा ही दी है। और कर्मोंका सर्वथा त्यागी भक्त भी अहर्निश भगवान्‌के प्रेममें मस्त होकर भगवच्चिन्तनरूपी कर्म तो छोड़ ही नहीं सकता। इसलिये देवर्षिकथित भक्तिमें ज्ञान और कर्म दोनों ही हैं, अवश्य ही वे होने चाहिये भक्तिके अनुकूल। शुष्क ज्ञान और कर्मको इसमें स्थान नहीं है। इसमें ऊपर-नीचे, बाहर-भीतर सर्वत्र रस-ही-रस है। भगवान् रसमय हैं ही और उसी रसमें परम आनन्द है। श्रुति भी यही कहती है— ‘रसो वै सः। रसं ह्येवायं लब्ध्वानन्दी भवति।’ भक्तिसे ही उस रसमय भगवान्‌के प्रत्यक्ष दर्शन होते हैं। भक्तिसे ही वह ऋषि-मुनि-देवदुर्लभ परमानन्द मिलता है। अतएव भक्तिका ही आश्रय सबको लेना चाहिये। श्रीमद्भागवतमें कहा गया है— सूर्यभगवान् रोज-रोज उदय और अस्त होते हैं, इसमें मनुष्योंकी आयु वृथा ही नष्ट होती है। बस, उतना ही समय सफल होता है जिसमें हरिचर्चा की जाती है। संसारमें जीते रहना और खाना-पीना कोई महत्त्वकी बात नहीं है। जैसे मनुष्य जीते