प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार) द्वारा
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हैं, वैसे ही क्या जड वृक्ष नहीं जीवित रहते ? लोहारकी धौंकनी क्या मनुष्योंके समान ही साँस नहीं लेती ? गाँवोंके पशु, कुत्ते, सूअर आदि क्या भोजन नहीं करते और मलमूत्रका त्याग नहीं करते ? कुत्ते जिस प्रकार दर-दर भटकते हुए लाठियाँ खाते हैं, गाँवोंके सूअर जैसे असार वस्तु ग्रहण करते हैं, ऊँट जैसे काँटे खाता है और गदहा जैसे केवल बोझ ढोता है, ठीक वैसे ही भगवान्की भक्तिसे हीन मनुष्य कुत्तेके समान सब ओरसे तिरस्कार पाता है, सूअरके समान असार विषयोंको ग्रहण करता है, ऊँटके समान दुःखभरे विषयरूपी काँटोंको खा-खाकर सदा दुःखी रहता है और गदहेके समान संसारके भारको ढोता और रोता रहता है। मनुष्यके वे कान साँपके बिलके समान हैं, जिनमें भगवान् श्रीकृष्णकी लीला नहीं जाकर विषयवार्तारूपी साँप जाते हैं। वह जीभ मेंढककी जीभके समान है जो भगवान्के नाम-गुण नहीं गाती। वह सिर सुन्दर बालों और साजोंसे सजा हुआ होनेपर भी भाररूप है जो श्रीहरिके सामने नहीं झुकता। वे हाथ मुर्देके हाथोंके समान हैं जो सोनेके गहनोंसे सजे होनेपर भी कभी श्रीहरिकी सेवा नहीं करते। मनुष्यकी वे आँखें मोरकी पाँखोंमें दीखनेवाली आँखोंके समान वृथा हैं जो भगवान्की पवित्र मूर्तियोंका दर्शन नहीं करतीं। वे पैर पेड़ोंके समान व्यर्थ हैं जो भगवान्के पवित्र स्थानों (मन्दिरों और तीर्थों)-में नहीं जाते। वह मनुष्य जीता ही मरेके समान है जो श्रीभगवान्की चरणधूलिको सिरपर नहीं धारण करता या भगवान्के चरणोंपर चढ़ी हुई तुलसीकी गन्धको नहीं सूँघता। और वह हृदय तो वज्रका ही है जो श्रीहरिनामोंको सुनकर उमड़ नहीं आता, गद्गद नहीं होता, जिससे रोमांच नहीं होता और नेत्रोंमें आनन्दके आँसू नहीं भर आते।'