प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभक्तिके साधन और अन्तराय ११७ न वयं साध्वि साम्राज्यं स्वाराज्यं भौज्यमप्युत। वैराज्यं पारमेष्ठ्यं च आनन्त्यं वा हरेः पदम्॥ कामयामह एतस्य श्रीमत्पादरजः श्रियः। कुचकुंकुमगन्धाढ्यं मूर्ध्ना वोढुं गदाभृतः ॥ (श्रीमद्भागवत १०।८३।४१-४२) 'हे साध्वी! हमें पृथ्विके साम्राज्य, इन्द्रके राज्य, भौज्यपद, सिद्धियाँ, ब्रह्माके पद, मोक्ष या वैकुण्ठकी भी इच्छा नहीं है। हम तो केवल यही चाहती हैं कि भगवान् श्रीकृष्णकी कमलाकुच-कुंकुमकी सुगन्धसे युक्त चरणधूलिको ही सदा अपने मस्तकोंपर लगाती रहें।' मुक्ति तो ऐसे भक्तोंके चरणोंपर लोटा करती है— यदि भवति मुकुन्दे भक्तिरानन्दसान्द्रा विलुठति चरणाग्रे मोक्षसाम्राज्यलक्ष्मीः ॥ 'जिसकी श्रीमुकुन्दके चरणोंमें परमानन्दरूपा भक्ति होती है, मोक्षसाम्राज्यश्री उसके चरणोंमें लोटती हैं।' आदर्श प्रेममयी भक्तशिरोमणि गोपियाँ प्रियतम भगवान्के आँखोंसे ओझल हो जानेपर विलाप करती हुई कहती हैं— विरचिताभयं वृष्णिधुर्य ते चरणमीयुषां संसृतेर्भयात्। करसरोरुहं कान्त कामदं शिरसि धेहि नः श्रीकरग्रहम्॥ व्रजजनार्तिहन् वीर योषितां निजजनस्मयध्वंसनस्मित। भज सखे भवत्किंकरीः स्म नो जलरुहाननं चारु दर्शय ॥ प्रणतकामदं पद्मजार्चितं धरणिमण्डनं ध्येयमापदि। चरणपंकजं शन्तमं च ते रमण नः स्तनेष्वर्पयाधिहन् ॥ (श्रीमद्भागवत १०।३१।५-६, १३) 'हे यदुकुलशिरोमणि! जो लोग संसारके भयसे तुम्हारे चरणोंकी शरण लेते हैं, तुम्हारे करसरोज उन्हें अभय देकर उनकी