प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११८ प्रेम-दर्शन अभिलाषाओंको पूर्ण करते हैं। हे प्रियतम ! अपने उन्हीं करकमलोंको, जिनसे आपने लक्ष्मीका हाथ पकड़ा है, हमारे सिरपर रखिये। हे व्रजवासियोंके दुःखोंको हरनेवाले वीर ! आपकी मन्द मधुर मुसकान भक्तोंके गर्वको हरनेवाली है। हे सखे ! हम आपकी किंकरी हैं, कृपा करके हमें स्वीकार कीजिये और अपना सुन्दर मुखकमल हमें दिखाइये। हे रमण ! हे आर्तिनाशन ! तुम्हारे चरणारविन्द प्रणत जनोंकी कामना पूरी करनेवाले हैं, लक्ष्मीजीके द्वारा सदा सेवित हैं, पृथ्वीके आभूषण हैं, विपत्तिकालमें ध्यान करनेसे कल्याण करनेवाले हैं, हे प्रियतम ! उन परम कल्याणमय सुशीतल चरणोंको हमारे तप्त हृदयपर स्थापित कीजिये।' इस प्रकार प्रेमी भक्त श्रीकृष्णके कामसे पीड़ित हुए सदा उन्हींके लिये रोया करते हैं और उन्हें पुकारा करते हैं; और आँखमिचौनीकी-सी लीला करनेवाले लीलाविहारी भगवान् जब उनकी प्रेम-पुकार सुनकर त्रिभुवन-कमनीय, योगिजनदुर्लभ, देवदेवप्रत्याशित, ऋषि-महर्षि-महापुरुषचित्ताकर्षक, निखिलसौन्दर्यमाधुर्य-रसामृतसारभूत, आनन्दकन्द मदनमोहन मन्मथमन्मथरूपमें मन्द-मन्द मुसकाते हुए और मुरलीमें अपना दिव्य मोहन सुर भरते हुए सहसा प्रकट होकर अपनी प्रेमानन्दरसमाधुरी चारों ओर बिखेर देते हैं, जब अपने सौन्दर्यमाधुर्यसुधासुशीतल वदनविधुकी शुभ्र ज्योत्स्ना चारों ओर छिटका देते हैं, तब वहाँ उन भाग्यवान् दिव्यचक्षु दिव्यभावापन्न भक्त महात्माओंके चित्तोंकी क्या अवस्था होती है, इसका वर्णन करनेकी शक्ति किसीमें भी नहीं है। यह अनिर्वचनीय रहस्य है। उस समय भक्तका अपना सब कुछ उनके चरणोंमें स्वयमेव