भारतकोश
प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार) द्वारा

DevanagariHindipublished178 पृष्ठ

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भक्तिके साधन और अन्तराय १११ न्योछावर हो जाता है और वह आनन्दोल्लासमें मत्त होकर सारे जगत्‌की परवा छोड़कर पुकार उठता है— घर तजौं, बन तजौं, नागर नगर तजौं, वंसीबट-तट तजौं, काहूपै न लजिहौं। देह तजौं, गेह तजौं, नेह कहो कैसे तजौं, आज राजकाज सब ऐसे साज सजिहौं॥ बावरो भयो है लोक बावरी कहत मोकौं, बावरी कहेते मैं काहू ना बरजिहौं। कहैया सुनैया तजौं, बाप और भैया तजौं, दैया तजौं मैया! पै कन्हैया नाहिं तजिहौं॥ जीना और मरना तुम्हारे ही लिये होगा और तुम्हारे ही चरणोंमें होगा। मेरे हृदयकी यही एकमात्र कामना है। जब सब कुछ न्योछावर हो गया तो फिर मरनेके बाद शरीरके ये पाँचों भूत अलग-अलग बिखरकर भी तुम्हारी ही सेवा करेंगे। कहीं ये पंचभूत जब मुझे छोड़कर अलग हों तब प्रियतमकी सेवासे हट न जायँ, इसीलिये विह्वलचित्तसे भक्त विधातासे प्रार्थना करता है— पंचत्वं तनुरेतु भूतनिवहाः स्वांशे विशन्तु स्फुटं धातारं प्रणिपत्य हन्त शिरसा तत्रापि याचे वरम्। तद्वापीषु पयस्तदीयमुकुरे ज्योतिस्तदीयांगन- व्योम्नि व्योम तदीयवर्त्मनि धरा तत्तालबृन्तेऽनिलः॥ इसीका अनुवाद करते हुए एक कविने कहा है— मरिबे डरौं न बिधिहिं बस, पंचभूत करि बास। पी-बापी, मारग, मुकुर, बीजन, अँगन अकास॥ पाँचों तत्त्व तो अलग-अलग होंगे ही, हे प्रभो! आप इतना कर दीजिये कि जलका भाग उस कुएँमें जाकर मिल जाय