भारतकोश
प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार) द्वारा

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१२६ प्रेम-दर्शन ही कान्ताभावकी प्राप्ति होती है। दास्यभावके सम्बन्धमें श्रीगोसाईंजी महाराज कहते हैं— मेरे जातिपाँति न चहौं काहूकी जातिपाँति, मेरे कोऊ कामको न हौं काहूके कामको। लोक परलोक रघुनाथहीके हाथ सब, भारी है भरोसो तुलसीके एक नामको॥ अति ही अयाने उपखाने नहीं बूझैं लोग, साहहीको गोत गोत होत है गुलामको। साधु कै असाधु, कै भलो कै पोच, सोच कहा, का काहूके द्वार परौं जो हौं सो हौं रामको॥ स्वामी और सेवकका कुल-गोत्र एक हो गया। इस दास्यभावकी महिमा गाती हुई भगवती श्रीराधिकाजी भक्तवर उद्धवजीसे कहती हैं— कृष्णभक्तिः कृष्णदास्यं वरेषु च वरं वरम्। श्रेष्ठा पंचविधामुक्तेर्हरिभक्तिर्गरीयसी ॥ ब्रह्मत्वादपि देवत्वादिन्द्रत्वादमरादपि। अमृतात् सिद्धिलाभाच्च हरिदास्यं सुदुर्लभम् ॥ (ब्रह्मवैवर्त० कृ० ९७।८-९) 'सब वरोंमें श्रेष्ठतम वर श्रीकृष्णभक्ति या श्रीकृष्णदास्य ही है। पाँच प्रकारकी श्रेष्ठ मुक्तियोंसे हरिभक्ति ही श्रेष्ठ एवं गुरुतर है। ब्रह्मत्व, देवत्व, अमरत्व, अमृतप्राप्ति, सिद्धिलाभ—इन सभीसे श्रीहरिका दासत्व प्राप्त होना सुदुर्लभ है।' कान्ताभक्तिमें तो एकात्मता है ही— प्रीति जो मेरे पीवकी, बैठी पिंजर माहिं। रोम रोम पिउ पिउ करै, 'दादू' दूसर नाहिं॥