प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रेमी भक्तोंकी महिमा १२७ प्रीतमको पतियाँ लिखूँ, जो कहूँ होय बिदेस। तनमें, मनमें, नैनमें, ताको कहा सँदेस॥ कान्ता और कान्त तो घुल-मिलकर एक हो जाते हैं—अतएव वहाँ त्रिरूपका भंग आप ही हो जाता है। सूत्रकार कहते हैं, इस एकात्मताके आदर्शको सामने रखकर, इस भावको मनमें स्थान देकर दास्यभाव या कान्ताभावसे भगवान्के प्रति केवल प्रेम ही करो। भक्ता एकान्तिनो मुख्याः ॥ ६७ ॥ ६७-एकान्त ( अनन्य ) भक्त ही श्रेष्ठ हैं। इससे पूर्व सूत्रके अनुसार भक्ति करनेवाला भगवान्का अनन्य भक्त ही सबमें श्रेष्ठ है। क्योंकि उसका तन, मन, धन सब कुछ परमात्माका हो जाता है। वह परमात्माका यन्त्रवत् होकर संसारमें रहता है। उसका आत्मा परमात्मासे मिल जाता है, उसका मन परमात्माके मनमें रम जाता है, उसके नेत्र सब जगह सर्वदा परमात्माको ही देखते हैं— प्रीतम छबि नैनन बसी, पर छबि कहाँ समाय। भरी सराय 'रहीम' लखि, आप पथिक फिरि जाय ॥ 'कबिरा' काजर-रेखहू, अब तो दई न जाय। नैननि पीतम रमि रहा, दूजा कहाँ समाय ॥ आठ पहर चौंसठ घरी, मेरे और न कोय। नैना माहीं तू बसै, नींदहिं ठौर न होय ॥ कण्ठावरोधरोमांचाश्रुभिः परस्परं लपमानाः पावयन्ति कुलानि पृथिवीं च ॥ ६८ ॥ ६८-ऐसे अनन्य भक्त कण्ठावरोध, रोमांच और अश्रुयुक्त नेत्रवाले होकर परस्पर सम्भाषण करते हुए अपने कुलोंको और पृथिवीको पवित्र करते हैं।