प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभक्तिके प्रधान सहायक १५१ कर अभीसे भजन-साधन आरम्भ कर देना चाहिये। सत्संगसे प्राप्त सदिच्छाके सुअवसरको खो नहीं देना चाहिये। स्वास्थ्य भी सदा अच्छा रहेगा, यह भी निश्चय नहीं है। जबतक स्वास्थ्य ठीक है तभीतक साधन-भजन होता है। स्वास्थ्य बिगड़ जानेपर, इन्द्रियोंके असक्त हो जानेपर और बुढ़ापा आ जानेपर, यदि पहले पूरा अभ्यास नहीं किया गया है तो भजनमें मन ही नहीं लगेगा। महाराजा भर्तृहरिने इसीलिये कहा है— यावत्स्वस्थमिदं कलेवरगृहं यावच्च दूरे जरा यावच्चेन्द्रियशक्तिरप्रतिहता यावत्क्षयो नायुषः। आत्मश्रेयसि तावदेव विदुषा कार्यः प्रयत्नो महान् प्रोद्दीप्ते भवने च कूपखननं प्रत्युद्यमः कीदृशः॥ (वैराग्यशतक) 'जबतक शरीर स्वस्थ है, बुढ़ापा नहीं आया है, इन्द्रियोंकी शक्ति पूरी बनी हुई है, आयुके दिन शेष हैं, तभीतक बुद्धिमान् पुरुषको अपने कल्याणके लिये अच्छी तरह यत्न कर लेना चाहिये। घरमें आग लग जानेपर कुआँ खोदनेसे क्या होगा?' इसीलिये भक्तगण भगवान्के शरण होकर पुकारा करते हैं— आयुर्नश्यति पश्यतां प्रतिदिनं याति क्षयं यौवनं प्रत्यायान्ति गताः पुनर्न दिवसाः कालो जगद्भक्षकः। लक्ष्मीस्तोयतरंगभंगचपला विद्युच्चलं जीवितं तस्मान्मां शरणागतं शरणद! त्वं रक्ष रक्षाधुना॥ 'आयु प्रतिदिन देखते-देखते नष्ट हो रही है, जवानी बीती जा