भारतकोश
प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार) द्वारा

DevanagariHindipublished178 पृष्ठ

पृष्ठ 154, कुल 178 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 154

१५२ प्रेम-दर्शन रही है, गये हुए दिन लौटकर नहीं आते, काल जगत्को खा रहा है, लक्ष्मी जलके तरंगकी भाँति चंचल है और जीवन तो बिजलीकी चमकके समान अस्थिर है; अतएव हे शरण देनेवाले प्रभु! मुझ शरणागतकी तुम अभी रक्षा करो।' कृष्ण त्वदीयपदपंकजपञ्जरान्ते अद्यैव मे विशतु मानसराजहंसः। प्राणप्रयाणसमये कफवातपित्तैः कण्ठावरोधनविधौ स्मरणं कुतस्ते॥ 'हे कृष्ण! तुम्हारे पदकमलरूपी पिंजरेमें मेरा यह मनरूपी राजहंस आज ही प्रवेश कर जाय। प्राण निकलनेके समय जब कफ, वायु और पित्तके बढ़नेपर कण्ठ रुक जायगा, उस समय तुम्हारा स्मरण कहाँसे होगा?' अतएव जरा-सा भी काल भगवान्‌के भजनके बिना नहीं बिताना चाहिये। जो समय भगवद्भजनमें जाता है वही सार्थक है, शेष सब व्यर्थ है। समयका मूल्य समझकर एक-एक साँसको खूब सावधानीके साथ कंजूसके परिमित पैसोंकी भाँति केवल भगवच्चिन्तनमें ही लगाना उचित है। भजनहीन काल ही वास्तवमें हमारे लिये भयंकर काल है। वही सबसे बड़ी विपत्ति है। कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई। जब तव सुमिरन भजन न होई॥ सा हानिस्तन्महच्छिद्रं स मोहः स च विभ्रमः। यन्मुहूर्तं क्षणं वापि वासुदेवं न कीर्तयेत्॥ 'जो घड़ी या एक क्षण भी श्रीभगवान्‌के कीर्तन बिना बीत गया उसीको सबसे बड़ा नुकसान, अज्ञान और मोह जानना चाहिये।'