भारतकोश
प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार) द्वारा

DevanagariHindipublished178 पृष्ठ

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प्रेमा-भक्तिका फल और भक्तिकी सर्वश्रेष्ठता १७१ स्वरूप मायिक नहीं होता। वह सर्वथा दिव्य होता है और जिस क्षण वह भक्तके सामने उसके प्रेमके आकर्षणसे प्रकट होता है उसी क्षण उसे दिव्यभावापन्न करके अपने स्वरूपका अनुभव करा देता है। जबतक वह माधुरी सामने रहती है, तबतक भक्त किसी दिव्य राज्यमें रहता है। उसका सब कुछ दिव्य हुआ रहता है। उस कालमें वह सिवा भगवान्‌के माधुर्यके और कुछ भी नहीं देखता, सुनता। वह तन्मय हो जाता है और उसे भगवान्‌का यथार्थ अनुभव हो जाता है। त्रिसत्यस्य भक्तिरेव गरीयसी, भक्तिरेव गरीयसी ॥८१॥ ८१-तीनों ( कायिक, वाचिक, मानसिक ) सत्योंमें ( अथवा तीनों कालोंमें सत्य भगवान्‌की ) भक्ति ही श्रेष्ठ है, भक्ति ही श्रेष्ठ है। त्रिसत्य कायिक, वाचिक और मानसिक सत्यको कहते हैं। देवर्षि नारदजीको तीनों सत्योंसे भक्तिकी श्रेष्ठताका अनुभव हो चुका है। अतएव वे बार-बार यह घोषणा करते हैं कि भक्ति ही श्रेष्ठ है। वास्तवमें बात भी ऐसी ही है। उपनिषद्‌में भी इसी प्रकार घोषणा की गयी है— सर्वोपायान् परित्यज्य भक्तिमाश्रय। भक्तिनिष्ठो भव, भक्तिनिष्ठो भव। भक्त्या सर्वसिद्धयः सिद्ध्यन्ति भक्त्यासाध्यं न किंचिदस्ति। (त्रिपादविभूतिनारायणोपनिषद्) 'सब उपायोंको छोड़कर भक्तिका ही आश्रय लो। भक्तिनिष्ठ होओ, भक्तिनिष्ठ हो जाओ। भक्तिसे सब सिद्धियाँ