प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७२ प्रेम-दर्शन सफल हो जाती हैं। ऐसी कोई बात नहीं है जो भक्तिसे न होती हो।' मुक्ति भी मिलती है और मुक्तिदाता भगवान् सगुणरूपसे भी साथ खेलते हैं। स्वयं भगवान्के श्रीमुखके वचन हैं— यथाग्निः सुसमृद्धार्चिः करोत्येधांसि भस्मसात्। तथा मद्विषया भक्तिरुद्धवैनांसि कृत्स्नशः॥ (श्रीमद्भा० ११।१४।१९) 'हे उद्धव! जैसे जोरसे जली हुई अग्नि काठके ढेरको भस्म कर डालती है वैसे ही मेरी भक्ति सब (छोटे-बड़े) पापोंके समूहको जला देती है।' भक्तके साधनकी रक्षा भगवान् करते हैं और उसके फलस्वरूप अपनी प्राप्ति भी आप ही करवा देते हैं और सबका इसमें अधिकार है। अतएव भक्तिसे श्रेष्ठ और क्या होगा? भगवान्ने इसीलिये श्रीमद्भगवद्गीतामें भी जगह-जगह भक्तिकी प्रशंसा की है और बारहवें अध्यायमें तो भक्तको 'युक्ततम' तक कह दिया है। इसीलिये यहाँ देवर्षि नारद ताल ठोंक-ठोंककर मुक्तकण्ठसे वज्रगम्भीरस्वरसे घोषणा करते हैं कि कायिक, वाचिक, मानसिक तीनों सत्योंमें अथवा त्रिकालमें सत्यभगवान्की भक्ति ही सर्वश्रेष्ठ है, भक्ति ही सर्वश्रेष्ठ है। गुणमाहात्म्यासक्तिरूपासक्तिपूजासक्तिस्मरणासक्तिदास्या- सक्तिसख्यासक्तिकान्तासक्तिवात्सल्यासक्त्यात्मनिवेदनासक्ति- तन्मयतासक्तिपरमविरहासक्तिरूपा एकधाप्येकादशधा भवति॥८२॥