प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार) द्वारा
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हाहारावमसौ कुर्वन् दुर्भगो भिक्षते जनः। एतां मे शृणुत काकुं काकुं शृणुतमीश्वरौ॥ वाचेह दीनया याचे साक्रन्दमतिमन्दधीः। किरत करुणस्वान्तौ करुणोर्मिच्छटामपि॥ मधुराः सन्ति यावन्तो भावाः सर्वत्र चेतसः। तेभ्योऽपि प्रेम मधुरं प्रसादीकुरुतं निजम्॥ नाथितं परमेवेदमनाथजनवत्सलौ। स्वं साक्षाद्दास्यमेवास्मिन् प्रसादीकुरुतं जने॥ अंजलिं मूर्ध्नि विन्यस्य दीनोऽयं भिक्षते जनः। अस्य सिद्धिरभीष्टस्य सकृदप्युपपाद्यताम्॥ (स्तवपुष्पांजलि) सन् १९१६ ई० में सबसे पहले मैंने देवर्षि नारदके सूत्रोंकी एक बँगलामें छपी हुई पुस्तक देखी थी। उस समय मैं एकान्तवासमें था। भगवान्की कृपासे परमार्थ-साधनकी ओर कुछ मन लगता था, उसमें देवर्षिके सूत्रोंसे बड़ी सहायता मिली। वहीं सूत्रोंपर विचार करते-करते उनका भावार्थ लिखनेकी इच्छा हुई और कुछ समय बाद भावार्थ लिखा भी गया। छपानेकी न उस समय इच्छा थी और न सुविधा ही। लगभग सन् १९२० ई० में मैं बम्बईमें था, वहाँ एक दिन श्रीवेंकटेश्वरप्रेसके स्वामी स्व० सेठ खेमराजजीसे बातों-ही-बातोंमें सूत्रोंकी चर्चा चल गयी। उन्होंने बड़े आग्रहसे पाण्डुलिपि मुझसे ले ली और छापनेके लिये उसे प्रेसमें भी दे दिया; परन्तु असावधानतावश वहाँ पड़ी रह गयी। मुझे कोई विशेष आग्रह था नहीं, इससे मैंने कोई ताकीद नहीं की। सेठजीका स्वर्गवास हो गया। उसके अनन्तर कई वर्षों बाद मैं वहाँसे उस प्रतिको वापस माँग लाया। छपवानेका मन नहीं था। संकोच था कि भक्तिशास्त्रपर मैं टीका लिखनेवाला कौन?