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प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार) द्वारा

DevanagariHindipublished178 पृष्ठ

मायासे कौन तरता है ? ८९

—'एकान्त स्थानमें रहने और मनुष्योंकी भीड़-भाड़में प्रीति न रखनेकी आज्ञा दी है।' मनुष्य कितना भी साधन करनेकी चेष्टा करे, परन्तु जबतक वह विषय-वासनासे जकड़े हुए जनसमुदायमें और मोहक विषयोंसे भरे हुए स्थानोंमें रहेगा तबतक भगवान्‌में उसका मन लगना बहुत कठिन है; इसीलिये साधकको एकान्त देशमें रहकर भक्तिका साधन करना बतलाया गया है। साथ ही भगवान्‌के साथ प्रेमका बन्धन बाँधनेके लिये लोकबन्धनको तोड़ना आवश्यक है। एकान्त देशसेवनसे लोकसंग छूट जानेके कारण लोकबन्धन स्वयमेव ही ढीला हो जायगा। इसके अतिरिक्त भगवान्‌के रहस्य, प्रभाव और तत्त्वके साथ मृत्युमय और दुःखालय इस लोककी तुलना करके बारम्बार विचार करनेपर लोकबन्धन आप ही टूट जाता है। इसके बाद भक्तिके साधकको सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणोंसे परे होना पड़ेगा। संसारका प्रकाश इन गुणोंसे ही होता है। गुणोंका ही कार्य यह संसार है, अतएव इस संसारके पदार्थोंमें अनासक्ति या विरक्ति होना ही निस्त्रैगुण्य या असंसारी होना है। जो मनुष्य विषयासक्त और विषयकामी है, वही गुणबद्ध है और जो भगवदासक्त और भगवत्प्रेमी है वही निस्त्रैगुण्य है। जो निस्त्रैगुण्य होगा वह योगक्षेमकी चिन्ता क्यों करने लगा ? संसारमें तो उसका कोई प्रलोभन ही नहीं है, क्योंकि वह निस्त्रैगुण्य है और मोक्षकी सिद्धिसे भी वह निःस्पृह है; क्योंकि वह भगवान्‌का प्रेमी है। अप्राप्तकी प्राप्तिको 'योग' और प्राप्तके संरक्षणको 'क्षेम' कहते हैं। इसमें केवल भोजनाच्छादनका भाव ही नहीं है; पारमार्थिक अर्थमें तो योगका अर्थ है भगवत्-प्राप्ति या भगवत्-प्राप्तिका सफल साधन, और क्षेमका अर्थ है भगवत्-प्राप्तिके साधनका संरक्षण। प्रेमी भगवद्भक्त इन दोनों ही अर्थोंमें योगक्षेमकी परवा नहीं करता, वह तो भगवत्-

९० प्रेम-दर्शन प्रेममें ही मस्त रहकर भगवत्-प्रेरणासे सदा-सर्वदा भगवदनुकूल स्वाभाविक कर्म करता रहता है। भक्तका योगक्षेम स्वयं भगवान् ही चलाते हैं। श्रीभगवान्‌ने गीतामें स्वयं कहा है— अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते। तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥ (९।२२) ‘जो अनन्य भक्त निरन्तर मेरा चिन्तन करते हुए मेरी निष्काम उपासना करते हैं उन नित्य मुझमें लगे रहनेवाले भक्तोंका योगक्षेम मैं स्वयं वहन करता हूँ।’* भोजनादिकी चिन्ता तो साधारण विश्वासी भक्तको भी नहीं करनी चाहिये; जो भोजनादिके लिये भगवान्‌का भरोसा न रखकर न्याय और सत्यमार्गका तथा सदाचारका त्यागकर पापकी शरण लेते हैं वे तो एक प्रकारसे नास्तिक ही हैं। कहा है—

  • श्रीजगन्नाथपुरीमें एक सरल हृदयके सदाचारी ब्राह्मण सपरिवार रहते थे। उनको गीतासे बड़ा प्रेम था, वह दिन-रात गीताका अध्ययन और मनन किया करते थे। अवश्य ही उनका सकाम भाव अभी दूर नहीं हुआ था, परन्तु थे वे बड़े विश्वासी। एक दिन वे गीताके प्रत्येक शब्दका क्रियात्मक अर्थ देखना चाहते थे। पाठ करते समय जब उपर्युक्त श्लोकका ‘वहाम्यहम्’ शब्द आया, तब ब्राह्मण सोचने लगे कि क्या भगवान् अपने भक्तके लिये आवश्यक वस्तुएँ स्वयं ढोकर उसके घर पहुँचा आते हैं; नहीं, नहीं! ऐसा नहीं हो सकता, भगवान् किसी दूसरे साधनसे संग्रह करा देते होंगे। यह विचारकर ब्राह्मणने ‘वहाम्यहम्’ का अर्थ ठीक न बैठते देख गीताके उक्त पदको काटकर उसकी जगह ऊपर ‘करोम्यहम्’ लिख दिया। ब्राह्मण भिक्षावृत्तिसे जीवननिर्वाह करते थे। भगवान्‌की अपार माया है; एक दिन मूसलाधार वृष्टि होने लगी। ब्राह्मणदेवता उस दिन घरसे न निकल सकनेके कारण दिनभर सपरिवार भूखे ही रहे। दूसरे दिन वर्षा बन्द होनेपर ब्राह्मण भीखके लिये चले। उनके घरसे जानेके थोड़ी ही देर बाद एक खूनसे लथपथ अत्यन्त ही सुन्दर बालक ब्राह्मणके घरपर आकर ब्राह्मणीसे बोला— ‘पण्डितजी महाराजने यह प्रसाद भेजा है।’ ब्राह्मणी बालकके मनोहर बदनको देखकर और उसके मीठे वचन सुनकर मुग्ध हो गयी, परन्तु उसके शरीरसे खून बहता देखकर उसे बहुत ही दुःख हुआ। उसने आँसूभरे नेत्रोंसे पूछा—‘तुमको किस निठुरने मारा है?’ बालकने ब्राह्मणीके पतिका नाम लेकर कहा कि ‘मुझको ब्राह्मणदेवताने मारा है।’

मायासे कौन तरता है ? ९१ भोजनाच्छादने चिन्तां वृथा कुर्वन्ति वैष्णवाः। योऽसौ विश्वम्भरो देवः स किं दासानुपेक्षते ॥ 'वैष्णव आहारादिके लिये व्यर्थ ही चिन्ता करते हैं। जो भगवान् समस्त विश्वके सब जीवोंका भरण-पोषण करते हैं वे क्या अपने सेवकोंको कभी भूल सकते हैं? यः कर्मफलं त्यजति, कर्माणि संन्यस्यति ततो निर्द्वन्द्वो भवति ॥ ४८ ॥ ४८-जो कर्मफलका त्याग करता है, कर्मोंका भी त्याग करता है और तब सब कुछ त्यागकर जो निर्द्वन्द्व हो जाता है। योगक्षेमकी चिन्ताका त्याग करनेवाला कर्मफलका त्यागी होता ही है, अथवा योगक्षेमके त्यागके लिये भी कर्मफलके त्यागकी आवश्यकता होती है। वस्तुतः अब यहाँसे प्रेमी भक्तके लक्षणोंका आरम्भ हो गया है। ये भक्तिके साधकोंके लिये आदर्श साधन हैं और सिद्ध प्रेमी भक्तोंके स्वाभाविक गुण ! भक्त जो कुछ ब्राह्मणी तो अचरजमें डूब गयी; कहने लगी—'वह तो बड़े सीधे-सादे, अक्रोधी और परम भागवत हैं; तुम-सरीखे नयनमनलुभावन बालकको वह क्यों मारने लगे ?' बालकने कहा—'मैं सच कहता हूँ माँ! उन्होंने ही एक शूलसे मेरे बदनको काट डाला है, उन्होंने क्यों ऐसा किया, इस बातको तो वही जानें।' इतना कहकर और प्रसाद रखकर बालक वहाँसे चल दिया; ब्राह्मणीको अन्यमनस्क होनेके कारण उसको जानेका पता नहीं लगा। वह कुछ भी न समझकर अति दुःखित चित्तसे स्वामीके घर आनेकी बाट देखने लगी। समयपर ब्राह्मण घर आये। ब्राह्मणीने विनयके साथ, किन्तु रोष और विषादभरे शब्दोंमें सारा वृत्तान्त ब्राह्मणको कह सुनाया। पण्डितजी गृहिणीकी बात सुनकर अवाक् हो गये। गीताके श्लोकपर हरतालकी कलम फेरनेकी घटनाको स्मरणकर वह व्याकुल हो उठे। उनकी आँखोंसे आँसुओंकी धारा बहने लगी। ब्राह्मण अब समझे कि सचमुच ही भगवान् अपने विश्वासी भक्तके लिये स्वयं सिरपर ढोकर आहारादि पहुँचाते हैं। गीता श्रीभगवान्‌का अंग है। गीताका श्लोक काटनेसे भगवान्‌के शरीरपर चोट लगी है। ब्राह्मण अपनी करनीपर पश्चात्ताप करते-करते मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़े। भगवान्‌ने उन्हें दर्शन देकर कृतार्थ किया। कुछ समय बाद उठकर वे भगवान्‌से क्षमा-प्रार्थना करने लगे और भावविह्वल होकर गीताके चारों ओर 'वहाम्यहम्' 'वहाम्यहम्' लिखने लगे !

९२ प्रेम-दर्शन करता है वह भगवान्के लिये ही करता है, उसे उसका अपने लिये कुछ भी फल नहीं चाहिये। उसकी न कर्ममें आसक्ति है और न उसके फलमें; वह तो यन्त्रवत् कर्म करता रहता है। परन्तु जहाँतक उसे यह स्मरण रहता है कि मैं यन्त्र हूँ, भगवान्के लिये कर्म करता हूँ, वहाँतक वह कर्मफलका ही त्यागी कहा जा सकता है; कर्मका त्यागी तो तब होगा जब उसे यह भी पता नहीं रहेगा कि मैं भी कुछ करता हूँ। जब मन-बुद्धिके पूर्ण समर्पणसे भगवान् उसके अहंकारको सर्वथा हरण करके स्वयं ही उसके हृदयमन्दिरमें बैठकर कर्म करने-कराने लगेंगे, तब वह कर्मोंका सम्पूर्ण त्यागी होकर सर्वथा निर्द्वन्द्व हो जायगा। फिर उसे सुख- दुःख, हानि-लाभ, अपना-पराया, मैं-तू आदि द्वन्द्वोंसे कोई प्रयोजन ही नहीं रह जायगा। परन्तु जबतक ऐसी स्वाभाविक स्थिति न हो तबतक साधनरूपसे कर्मफलत्याग और भगवत्- विरोधी अथवा अनावश्यक कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करके निर्द्वन्द्व होनेकी चेष्टा करनी चाहिये। श्रीभगवान् कहते हैं— त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन। निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्॥ (गीता २।४५) 'हे अर्जुन! वेद तीनों गुणोंके प्रकाशरूप संसारको प्रकाश करनेवाले हैं; अतएव निस्त्रैगुण्य अथवा असंसारी (निष्कामी), सुख-दुःखादि द्वन्द्वोंसे रहित, योगक्षेमकी इच्छा न करनेवाला, नित्य सत्त्वमें स्थित और परमात्मपरायण हो जाओ।' वेदानपि संन्यस्यति, केवलमविच्छिन्नानुरागं लभते॥ ४९॥

मायासे कौन तरता है ? ९३ ४९-जो वेदोंका भी भलीभाँति परित्याग कर देता है और जो अखण्ड असीम भगवत्प्रेम प्राप्त कर लेता है। साधनकी दृष्टिसे उपर्युक्त श्रीमद्भगवद्गीताके श्लोक (२।४५)-के अनुसार तीनों गुणोंके प्रकाशरूप संसारको प्रकट करनेवाले वेदोंके त्यागसे निष्कामी बननेका अर्थ बहुत ही ठीक है। सकाम भावका त्याग ही वेदत्याग है। परन्तु देवर्षि नारद यहाँ जिस प्रेमावस्थाका वर्णन कर रहे हैं, उस अवस्थामें तो भक्त केवल एक अविच्छिन्न अखण्ड भगवत्प्रेमके महान् सागरमें डूबकर तन्मय हो जाता है; इससे वेदोंका आश्रय स्वयमेव ही छूट जाता है, उससे फिर लौकिक-वैदिक कोई- सी भी क्रिया यथाविधि नहीं हो सकती। सारे नियमोंका अपने-आप टूट जाना ही इस प्रेमका एक नियम है। यह भी शास्त्रविधि ही है। इस स्थितिमें वेद अपने अनुयायीको वेदोंका परमफल प्राप्त करते देखकर, उसकी चरम तृप्तिपर स्वयं तृप्त होकर उसे छोड़ देते हैं। यह वेदत्याग तिरस्कारमूलक नहीं है, वरं तृप्तिमूलक है। वह जान-बूझकर वेदोंको नहीं छोड़ता, वेद ही उसे पूर्णकाम समझकर अपना आधिपत्य उसपरसे उठा लेते हैं। इस अवस्थामें वह प्रेमी भक्त विधि- निषेधमय वेदोंको लाँघकर बस, केवल एक अनिर्वचनीय हरिप्रेममें ही मतवाला रहता है; वह भगवत्प्रेमकी एक जीती- जागती मूर्ति होता है। स्वयं भगवान् ही उसके शरीरमें दिव्य प्रेमके रूपमें प्रकट होकर लीला करते हैं। स तरति स तरति स लोकांस्तारयति ॥५०॥ ५०-वह तरता है, वह तरता है, वह लोकोंको तार देता है।

९४ प्रेम-दर्शन देवर्षि नारद आनन्दमें भरकर पुकार रहे हैं कि जो इस प्रकार भगवान्‌के प्रेममें मतवाला हो जाता है वह स्वयं तो तर ही गया, अपितु वह समस्त लोकोंको भी तार देता है। वही सच्चा तरन-तारन होता है। भगवान्‌ने भी श्रीमद्भागवतमें कहा है—‘मद्भक्तियुक्तो भुवनं पुनाति’—ऐसा मेरा भक्त त्रिभुवनको पवित्र कर देता है। छियालीसवें सूत्रमें मायासे कौन तरता है, यह प्रश्न करके यहाँतक उसका उत्तर दिया गया। चार सूत्रोंमें प्रेमके साधन और प्रेमियोंके लक्षण बतलाये गये। अब आगे उस प्रेमका रूप बतलाया जायगा, जिसको पाकर प्रेमी महानुभावगण इस दुर्लभ स्थितिको स्वाभाविक गुणोंके रूपमें अनायास ही प्राप्त हो जाते हैं। ☐ ☐

प्रेमरूपा भक्ति और गौणी भक्तिका स्वरूप अनिर्वचनीयं प्रेमस्वरूपम् ॥ ५१ ॥ ५१-प्रेमका स्वरूप अनिर्वचनीय है। प्रेम और परमात्मामें कोई अन्तर नहीं; जिस प्रकार वाणीसे ब्रह्मका वर्णन असम्भव है, वेद ‘नेति-नेति’ कहकर चुप हो जाते हैं, इसी प्रकार प्रेमका वर्णन भी वाणीद्वारा नहीं हो सकता। संसारमें भी हम देखते हैं कि प्रिय वस्तुके मिलनेपर, उसका समाचार पानेपर, उसके स्पर्श, आलिंगन और प्रेमालापका सुअवसर मिलनेपर हृदयमें जिस आनन्दका अनुभव होता है, उसका वर्णन वाणी कभी नहीं कर सकती। जिस प्रेमका वर्णन वाणीके द्वारा हो सकता है, वह तो प्रेमका सर्वथा बाहरी रूप है। प्रेम तो अनुभवकी वस्तु है। भगवान् श्रीराम लंकामें स्थित जगज्जननी जानकीजीको सँदेसा कहलाते हैं— तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा। जानत प्रिया एकु मनु मोरा॥ सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं। जानु प्रीति रसु एतनेहि माहीं॥ प्रेमका अनुभव है मनमें और मन रहता है सदा अपने प्रेमीके पास। फिर भला, मनके अभावमें वाणीको यत्किंचित् भी वर्णन करनेका असली मसाला कहाँसे मिले? अतएव प्रेमका जो कुछ भी वर्णन मिलता है वह केवल सांकेतिकमात्र है—बाह्य है। प्रेमकी प्राप्ति हुए बिना तो प्रेमको कोई जानता नहीं और प्राप्ति होनेपर वह अपने मनसे हाथ धो बैठता है। जलमें मुखसे शब्दका उच्चारण तभीतक होता है जबतक कि मुख जलसे बाहर रहता है, जब मनुष्य अतलतलमें डूब जाता

९६ प्रेम-दर्शन है तब तो डूबनेवालेकी लाशका पता लगना भी कठिन होता है। इसी प्रकार जो प्रेमसमुद्रमें डूब चुका है, वह कुछ कह ही नहीं सकता और ऊपर-ऊपर डुबकियाँ मारने और डूबने- उतरानेवाले जो कुछ कहते हैं सो केवल ऊपर-ऊपरकी ही बात कहते हैं— डूबै सो बोलै नहीं, बोलै सो अनजान। गहरौ प्रेम-समुद्र कोउ डूबै चतुर सुजान॥ मूकास्वादनवत् ॥ ५२ ॥ ५२-गूँगेके स्वादकी तरह। जैसे गूँगा गुड़ खाकर प्रसन्न होता है, हँसता है, परन्तु गुड़़का स्वाद नहीं बतला सकता; इसी प्रकार प्रेमी महात्मा प्रेमका अनुभव कर आनन्दमें निमग्न हो जाते हैं, परन्तु अपने उस अनुभवका स्वरूप दूसरे किसीको भी बतला नहीं सकते। इस प्रेममें तन्मयता होती है। इसलिये प्रेमी यह नहीं जानता कि मैं क्या हूँ और क्या जानता हूँ। इसीसे श्रीराधाने एक समय कहा है कि हे सखि! मैं कृष्णप्रेमकी बात कुछ भी नहीं जानती, नहीं समझती और जो कुछ जानती हूँ उसे प्रकट करनेयोग्य भाषा मेरे पास नहीं है। मैं तो इतना ही जानती हूँ कि जब हृदयके अंदर उनका स्पर्श होता है, तभी मेरा सारा ज्ञान चला जाता है। प्रकाशते * क्वापि पात्रे ॥ ५३ ॥ ५३-किसी बिरले योग्य पात्रमें ( प्रेमी भक्तमें ) ऐसा प्रेम प्रकट भी होता है। यह तो निश्चित है कि वाणीद्वारा प्रेमका स्वरूप नहीं

  • पाठभेद 'प्रकाशयते' ।

प्रेमरूपा भक्ति और गौणी भक्तिका स्वरूप ९७ बतलाया जा सकता, परन्तु जब कोई प्रेममदसे छके हुए भाग्यवान् महापुरुष तन-मनकी सुधि भुलाकर दिव्य उन्मत्तवत् चेष्टा करने लगते हैं तब प्रेमका कुछ-कुछ प्रकाश लोगोंको प्रकट दीखने लगता है। उस समय ऐसे महात्माकी केवल वाणीसे और नेत्रोंसे ही नहीं, शरीरके रोम-रोमसे प्रेमकी किरणें अपने-आप ही निकलने लगती हैं। यह प्रेमका प्राकट्य साक्षात् भगवान्‌का ही प्रकाश है। ऐसा प्रकाश किसी बिरले ही प्रेमी महापुरुषमें होता है। गुणरहितं कामनारहितं प्रतिक्षणवर्धमानमविच्छिन्नं सूक्ष्मतरमनुभवरूपम् ॥ ५४ ॥ ५४-यह प्रेम गुणरहित है, कामनारहित है, प्रतिक्षण बढ़ता रहता है, विच्छेदरहित है, सूक्ष्मसे भी सूक्ष्मतर है और अनुभवरूप है। किसी गुणको देखकर जो प्रेम होता है वह तो गुण न दीखनेपर नष्ट हो जा सकता है। परन्तु असली प्रेममें गुणोंकी अपेक्षा नहीं है। प्रेमीको अपने प्रेमास्पदमें गुण-दोष देखनेका अवकाश ही कहाँ मिलता है, वहाँ तो स्वाभाविक सहज प्रेम होता है। अथवा यों कह सकते हैं कि प्रेम गुणातीत होता है। वह तीनों गुणोंके दायरेसे परेकी वस्तु है। प्रेममें कुछ भी कामना नहीं होती, क्योंकि प्रेममें प्रेमास्पदको सुखी देखनेकी एक इच्छाको छोड़कर अन्य किसी स्वार्थकी वासना ही नहीं रहती। उसका तो परम अर्थ केवल प्रेमास्पद ही है। जहाँ कुछ भी पानेकी वासना है वहाँ तो प्रेमका पवित्र आसन कुटिल कामके द्वारा कलंकित हो रहा है। अतएव प्रेममें कामनाका लेश भी नहीं है।

९८ प्रेम-दर्शन सच्चा प्रेम कभी घटता तो है ही नहीं, वरं वह सदा बढ़ता ही रहता है। प्रेममें कहीं परिसमाप्ति नहीं है। प्रेमीका सदा यही भाव रहता है कि मुझमें प्रेमकी कमी ही है। किसी भी अवस्थामें उसे अपना प्रेम बढ़ा हुआ नहीं दीखता, अतएव उसकी प्रत्येक चेष्टा स्वाभाविक ही प्रेम बढ़ानेकी होती है। इस विच्छेदरहित प्रेमकी सतत वृद्धिका क्रम कभी टूटता ही नहीं। यह विशुद्ध प्रेम दिन दूना, रात चौगुना बढ़ता ही रहता है। प्रेम सदा बढ़िबौ करै, ज्यों ससिकला सुबेष। पै पूनौ यामें नहीं, ताते कबहुँ न सेष॥ यह प्रेम हृदयकी गुप्त गुहामें रहनेवाला होनेके कारण सूक्ष्मसे भी सूक्ष्मतर होता है और केवल अनुभवमें ही आता है। प्रेमी रसखानजी मानो इसी सूत्रका अनुवाद करते हुए कहते हैं— बिनु जोबन गुन रूप धन, बिनु स्वारथ हित जानि। सुद्ध, कामना ते रहित, प्रेम सकल रसखानि॥ अति सूच्छम, कोमल अतिहि, अति पतरो, अति दूर। प्रेम कठिन सबते सदा, नित इकरस भरपूर॥ रसमय स्वाभाविक, बिना स्वारथ, अचल महान। सदा एक रस बढ़त नित सुद्ध प्रेम रसखान॥ यह प्रेम परम आनन्दमय है और आनन्दमय श्रीहरिके साथ मिलाकर प्रेमीको आनन्दमय बना देता है। तत्प्राप्य तदेवावलोकयति तदेव शृणोति तदेव भाषयति * तदेव चिन्तयति ॥ ५५ ॥

  • किसी-किसी प्रतिमें "तदेव भाषयति" नहीं है।

प्रेमरूपा भक्ति और गौणी भक्तिका स्वरूप ९९ ५५-इस प्रेमको पाकर प्रेमी इस प्रेमको ही देखता है, प्रेमको ही सुनता है, प्रेमका ही वर्णन करता है और प्रेमका ही चिन्तन करता है। परम प्रेमके दिव्य रसमें डूबा हुआ प्रेमानन्दमय प्रेमी सर्वत्र अपने प्रेममय, रसमय प्रियतमको ही देखता है। उसे कहीं दूसरी वस्तु दीखती ही नहीं। ऐसी ही स्थितिमें एक गोपी कहती है— जित देखौं तित स्याममई है। स्याम कुंज बन जमुना स्यामा, स्याम गगन घनघटा छई है॥ सब रंगनमें स्याम भरो है, लोग कहत यह बात नई है। मैं बौरी, की लोगन ही की स्याम पुतरिया बदल गई है॥ चंद्रसार रबिसार स्याम है, मृगमद स्याम काम बिजई है। नीलकंठको कंठ स्याम है, मनो स्यामता बेल बई है॥ श्रुतिको अच्छर स्याम देखियत, दीपसिखापर स्यामतई है। नर देवनकी कौन कथा है, अलख ब्रह्म छबि स्याममई है॥ दूसरा भक्त कहता है— बाटनमें घाटनमें बीथिनमें बागनमें, बृच्छनमें बेलिनमें बाटिकामें बनमें। दरनमें दीवारनमें देहरी दरीचनमें, हीरनमें हारनमें भूषनमें तनमें॥ काननमें कुंजनमें गोपिनमें गायनमें, गोकुलमें गोधनमें दामिनमें घनमें। जहाँ-जहाँ देखौं तहाँ स्याम ही दिखाई देत, सालिग्राम छाइ रह्यो नैननमें मनमें॥ कहि न जाय मुखसों कछू स्याम-प्रेमकी बात। नभ जल थल चर अचर सब स्यामहि स्याम दिखात ॥

१०० प्रेम-दर्शन ब्रह्म नहीं, माया नहीं, नहीं जीव, नहिं काल। अपनीहू सुधि ना रही, रह्यौ एक नँदलाल॥ को कासों केहि बिधि कहा, कहै हृदैकी बात। हरि हेरत हिय हरि गयो हरि सर्वत्र लखात॥ ऐसी अवस्थामें उसके कानमें जो कुछ भी आवाज आती है, वह केवल प्रेममयके प्रेमसंगीतकी स्वरलहरी ही होती है; वह सर्वदा उसकी मुरलीकी मीठी तानमें मस्त रहता है। इसी प्रकार उसके मुखसे भी प्रेममयको छोड़कर दूसरा शब्द नहीं निकलता। वह प्रेममयका गुण गाते-गाते कभी थकता ही नहीं, बात-बातमें उसे केवल दिव्य प्रेमरसामृतका ही अनुपम स्वाद मिलता रहता है और वह अतृप्त रसनासे सदा उसी अमृतरसपानमें मत्त रहता है। उसके चित्तमें तो दूसरेके लिये स्थान ही नहीं रह गया। वहाँ एकमात्र प्रियतमका ही अखण्ड साम्राज्य और पूर्ण अधिकार है। ऐसा जरा-सा भी स्थान नहीं, जहाँ किसी दूसरेकी कल्पनाकी स्मृति छायारूपसे भी आ सके। चित्त साक्षात् प्रियतमके प्रेमका स्वरूप ही बन जाता है; इस अवस्थाका अनुमान करते हुए कवि कहता है— कानन दूसरो नाम सुनै, नहिं एकहि रंग रँगो यह डोरो। धोखेहुँ दूसरो नाम कढ़ै, रसना मुख बाँधि हलाहल बोरो॥ ठाकुर चित्तकी वृत्ति यहै, हम कैसेहुँ टेक तजैं नहिं भोरो। बावरी वे अँखियाँ जरि जायँ जो साँवरो छाँड़ि निहारति गोरो॥ समस्त अंग केवल उसीका अनुभव कर रहे हैं। सम्पूर्ण इन्द्रियाँ उसीको विषय करती हैं। आँखें अहर्निश सम्पूर्ण विश्वको श्याममय देखती हैं। कान सदा उसीकी मधुरातिमधुर शब्द-ब्रह्ममयी वेणुध्वनि सुनते हैं। नासिका नित्य-निरन्तर

प्रेमरूपा भक्ति और गौणी भक्तिका स्वरूप १०१ उसी नटवरके अंगसौरभको ही सूंघती है। जिह्वा अविच्छिन्नरूपसे उसी प्रेसुधाका आस्वादन करती है और शरीर सर्वदा उसी अखिल सौन्दर्यमाधुर्य-रसाम्बुधि रसराज परम सुखस्पर्श आनन्दकन्द श्रीनन्दनन्दनके अनुपम स्पर्श-सुखका अनुभव करता है। आकाशमें वही शब्द है, वायुमें वही स्पर्श है, अग्निमें वही ज्योति है, जलमें वही रस है और पृथ्वीमें वही गन्ध बना हुआ है। सबमें वही भरा है। सबमें वही अनोखी रूपमाधुरीकी झाँकी दिखा रहा है। सर्वत्र प्रेम-ही-प्रेम, आनन्द-ही-आनन्द है। समस्त विश्व प्रेममय, आनन्दमय, रसमय या श्रीकृष्णमय है। सब कुछ आनन्दसे और सौन्दर्य-माधुर्यसे भरा है। दृश्य, द्रष्टा सभी मधुर हैं; हम-तुम सभी मधुर हैं; उस परमानन्द- रस-सुधामय मधुराधिपतिक सब कुछ मधुर है। 'मधु वाता ऋतायते, मधु क्षरन्ति सिन्धवः, माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः, मधुमत् पार्थिवं रजः' सर्वत्र मधु-ही-मधु। इस प्रकार प्रेमी भक्तकी दृष्टिमें सर्वत्र प्रेममय भगवान् हैं और भगवान्‌की दृष्टिमें भक्त। भगवान्‌ने कहा ही है— यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति। तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥ (गीता ६।३०) 'जो मुझे सर्वत्र देखता है और सबको मुझमें देखता है, न कभी मैं उसकी आँखोंसे ओझल होता हूँ और न वह मेरी आँखोंसे ओझल होता है।' इस अवस्थामें प्रेमी भक्त जिस नित्य महान् दिव्य प्रेमामृत- रससागरमें मग्न रहता है, वह सर्वथा अनिर्वचनीय है। यही प्रेमाभक्ति या पराभक्तिका स्वरूप है। यही महान् भूमानन्द है,

१०२ प्रेम-दर्शन इसी सर्वव्यापी भूमानन्दके साथ अल्प सुखका तारतम्य दिखलाती हुई श्रुति कहती है— यत्र नान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमाथ यत्रान्यत्पश्यत्यन्यच्छृणोत्यन्यद्विजानाति तदल्पम्, यो वै भूमा तदमृतमथ यदल्पं तन्मर्त्यम्। (छान्दोग्योपनिषद् ७।२४।१) 'जहाँ दूसरेको नहीं देखता, दूसरेको नहीं सुनता, दूसरेको नहीं जानता वही भूमा है और जहाँ दूसरेको देखता है, दूसरेको सुनता है, दूसरेको जानता है वह अल्प है। जो भूमा है वह अमृत है और जो अल्प है वह मरा हुआ है।' इसीलिये प्रेम सदा मधुर, अविनाशी, सनातन और सत्य है। गौणी त्रिधा गुणभेदादार्तादिभेदाद्वा ॥ ५६ ॥ ५६-गौणी भक्ति गुणभेदसे अथवा आर्तादिभेदसे तीन प्रकारकी होती है। पिछले सूत्रतक उस परा या मुख्या भक्तिका विवेचन हुआ जिसमें प्रेमी भक्त उस प्रेमाभक्तिसे अपने प्रियतम भगवान्के प्रेममय स्वरूपको प्राप्त हो जाता है। इसीको श्रीमद्भागवतमें अहैतुकी—निर्गुण भक्ति तथा गीतामें ज्ञानीकी भक्ति कहा है। अहैतुकी भक्तिमें भक्तकी चित्तवृत्ति और कर्मगतिका प्रवाह अविच्छिन्नरूपसे स्वाभाविक ही भगवान्की ओर बहता रहता है अर्थात् उसका चित्त निरन्तर निष्काम अनन्य प्रेमभावसे भगवान्में लगा रहता है और उसकी समस्त क्रियाएँ श्रीभगवान्के लिये ही होती हैं (भागवत ३।२९।११-१२) और गीतोक्त दुर्लभ तत्त्वज्ञानी महात्मा भक्त भी सब कुछ वासुदेव ही देखता है (अध्याय ७। १७)। ये दोनों तो भगवत्स्वरूप ही हैं। अब यहाँ

प्रेमरूपा भक्ति और गौणी भक्तिका स्वरूप १०३ इस भक्तिकी अपेक्षा निम्न श्रेणीकी गौणी भक्तिका वर्णन किया जाता है। यह गौणी भक्ति सात्त्विकी, राजसी और तामसी-भेदसे अथवा आर्त, जिज्ञासु और अर्थार्थी-भेदसे तीन प्रकारकी है। जो भक्ति पापनाशके उद्देश्यसे सब कर्मफलोंको भगवान्में समर्पण करनेके रूपमें अथवा जिसमें पूजन करना कर्तव्य है यह समझकर भेद-दृष्टिसे पूजा की जाती है, वह सात्त्विकी है (श्रीमद्भागवत ३।२९।१०)। जो भक्ति विषय, यश और ऐश्वर्यकी कामनासे भेददृष्टिपूर्वक केवल प्रतिमादिके पूजनके रूपमें ही की जाती है वह राजसी है (श्रीमद्भागवत ३।२९।९)। जो भक्ति क्रोधसे हिंसा, दम्भ और मत्सरताको लेकर भेद-दृष्टिसे की जाती है वह तामसी है (श्रीमद्भागवत ३। २९।८)। इसी तरह आर्त, जिज्ञासु और अर्थार्थी पुरुष त्रिविध उपासनासे तीन प्रकारकी भक्ति करते हैं; अर्थात् भक्तोंके भावभेदसे गौणी भक्तिके तीन भेद होते हैं। गौणी भक्तिके साधनोंसे यद्यपि साक्षात् भगवत्-प्राप्ति नहीं होती, तथापि इस गौणी भक्तिके साधक भी सुकृती ही होते हैं और उन्हें भी भगवत्कृपासे इसका अनुष्ठान करते-करते अन्तमें भगवत्-प्राप्तिकी मुख्य साधनस्वरूपा या साक्षात् भगवत्- स्वरूपा प्रेमा भक्तिकी प्राप्ति होती है। भगवान्की भक्तिमें यही विशेषता है कि इसका अन्तिम फल दुर्लभ भगवत्प्रेमकी प्राप्ति ही है। इसीसे गौणी भक्तिको भी श्रेष्ठ और पुण्यात्मा पुरुषोंद्वारा ही होनेवाली माना गया है; क्योंकि भक्तिमात्रमें ही भगवान्का भजन, भगवान्का आश्रय, भगवान्का ध्यान किसी-

१०४ प्रेम-दर्शन न-किसी रूपमें रहता है और भगवद्भजन, भगवदाश्रय तथा भगवान्‌के ध्यानका फल सीधा भगवत्प्राप्ति ही होता है। अतएव किसी प्रकारसे भी हो, भगवान्‌की भक्ति मनुष्यको अवश्य ही करनी चाहिये। परन्तु जहाँतक हो सके सात्त्विकी भक्ति अथवा त्रिभुवनके वैभवको भी अनर्थ एवं भगवान्‌को ही परम अर्थ—परम धन मानकर उसीके प्रेमकी प्राप्तिके लिये सच्चे अर्थार्थीके भावसे भक्ति करनी चाहिये। उत्तरस्मादुत्तरस्मात्पूर्वपूर्वा श्रेयाय भवति ॥ ५७॥ ५७-(उनमें) उत्तर-उत्तर क्रमसे पूर्व-पूर्व क्रमकी भक्ति कल्याणकारिणी होती है। तामसीकी अपेक्षा राजसी और राजसीकी अपेक्षा सात्त्विकी भक्ति उत्तम है। इसी प्रकार अर्थार्थी भक्तकी अपेक्षा जिज्ञासुकी और इन दोनोंकी अपेक्षा आर्तकी भक्ति विशेष कल्याणकारिणी होती है।

भक्तिकी सुलभता और महत्ता

अन्यस्मात् सौलभ्यं भक्तौ ॥ ५८ ॥ ५८-अन्य सबकी अपेक्षा भक्ति सुलभ है। इससे पहले भक्तिकी महिमा और कर्म, योग तथा ज्ञानादिकी अपेक्षा उसकी श्रेष्ठताका वर्णन किया गया है। अब सूत्रकार यह दिखलाते हैं कि इस प्रकार सर्वश्रेष्ठ होनेपर भी भक्तिकी प्राप्ति अन्यान्य फलोंकी अपेक्षा सहज और सुलभ है। भक्तिकी प्राप्तिमें न विद्याकी आवश्यकता है न धनकी, न श्रेष्ठ कुल प्रयोजनीय है और न उच्च वर्णाश्रम, न वेदाध्ययनकी आवश्यकता है न कठोर तपकी, न विवेककी जरूरत है न कठिन वैराग्यकी, आवश्यकता है केवल सरल भावसे भगवान्‌की अपार कृपापर विश्वास करके उनका सतत प्रेमभावसे स्मरण करनेकी। फिर सुलभता तो प्रत्यक्ष ही दीखने लगती है। भगवत्कृपा सबपर सदा-सर्वदा है। मनुष्य विश्वास नहीं करता, इसीसे वह वंचित रह जाता है। भगवान्‌ने तो गीतामें डंकेकी चोट कहा है कि ‘मैं सब प्राणियोंका सुहृद् हूँ, और जो मुझे सुहृद् जान लेता है वह उसी क्षण शान्ति पा जाता है’— सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति। (गीता ५।२९) मनुष्यको चाहिये कि वह भगवत्कृपापर विश्वास करके यह मान ले कि मैं भगवत्कृपाके समुद्रमें डूब रहा हूँ। मेरे ऊपर- नीचे, इर्द-गिर्द, भूत-भविष्यत्, सब स्थानों और सब कालमें भगवत्कृपा भरपूर है। ऐसा मानते ही वह उस भगवत्कृपाके प्रतापसे तुरन्त पाप-तापसे मुक्त होकर भगवान्‌की भक्तिका अधिकारी हो जाता है। भगवत्कृपापर इस प्रकार विश्वास और

१०६ प्रेम-दर्शन निश्चय करके भगवान्‌के अनन्य स्मरणका अभ्यास किसी भी अवस्थामें बालक, वृद्ध, युवा, स्त्री, पुरुष, ब्राह्मण, शूद्र कोई भी कर सकता है। इसमें न कुछ छोड़ना है और न ग्रहण करना है। सदा सबपर भगवत्कृपा होनेपर भी हमें जो विश्वास नहीं है, बस, उस विश्वासको स्थिर कर लेना है। फिर भक्तिकी प्राप्तिके सभी साधन अपने-आप सहज ही सिद्ध हो जायेंगे—(‘तस्याहं सुलभः पार्थ’—गीता ८।१४)। भक्ति किसी और साधनसे नहीं मिलती, यह भजनसे ही मिलती है। प्रमाणान्तरस्यानपेक्षत्वात् स्वयंप्रमाणत्वात् ॥ ५९ ॥ ५९-क्योंकि भक्ति स्वयं प्रमाणरूप है, इसके लिये अन्य प्रमाणकी आवश्यकता नहीं है। भक्तिके मार्गपर चलनेवाले पुरुषोंको भक्तिसुखका प्रमाण अपने-आप ही मिलता रहता है। उन्हें स्वयमेव अनुभव होता रहता है, दूसरे किसी प्रमाणकी इसमें आवश्यकता नहीं है। पतिसुखके आनन्दका अनुभव भार्या बननेपर ही मिल सकता है; यह कुमारी कन्याको समझानेकी बात नहीं है। इसी प्रकार भक्तिसुखका अनुभव भक्तोंको ही होता है, यह कहकर बतलानेकी बात नहीं है। जो पुण्यात्मा महानुभाव सब कामनाओंका त्याग कर एकमात्र भगवत्प्रेमकी कामनासे ही भगवत्कृपाका आश्रय लेकर भगवान्‌का सदा-सर्वदा प्रेमपूर्वक पुलकित चित्तसे भजन करते हैं वे ही भक्तिसुखका अनुभव करते हैं। शान्तिरूपात्परमानन्दरूपाच्च ॥ ६० ॥ ६०-भक्ति शान्तिरूपा और परमानन्दरूपा है। शान्ति और परम आनन्द साक्षात् भगवान्‌का स्वरूप है। अपने प्रेमरूपमें स्वयं भगवान् ही अवतीर्ण होते हैं, इसलिये यह भगवत्प्रेम भी शान्ति और परमानन्दस्वरूप ही है। आनन्दमय भगवान् स्वयं ही

भक्तिकी सुलभता और महत्ता १०७ अपनी ह्लादिनी नाम्नी आनन्दशक्तिको निमित्त बनाकर प्रेम और प्रेमिकाके रूपमें प्रकट होते हैं और स्वयं ही प्रेमास्पद बनकर अपने आनन्दका आप ही उपभोग करते हैं। यही उनकी आनन्दलीला है। यहाँपर यह समझ लेना चाहिये कि जिन भगवान्की भक्ति या प्रेम शान्तिरूप और परमानन्दरूप है, वे भगवान् निर्गुणवादियोंद्वारा माने हुए प्रकृतिसम्भव सत्त्व, रज, तमरूप त्रिगुणोंसे युक्त ‘सगुण ब्रह्म’ नहीं हैं। भगवान्का दिव्य तनु उनके अपने आनन्दांश, अपनी योगमायाके निमित्तसे नित्य ही प्रकट है। इसीलिये आत्माराम, मुनि, जीवन्मुक्त महापुरुष, व्यास, नारद, शुकदेव, जनक, सनकादि महात्मा उनके एक-एक दिव्य गुण, दिव्य आभूषण, दिव्य गन्ध, दिव्य मुरली- ध्वनि और दिव्य सौन्दर्यपर मुग्ध हो जाते हैं। यदि भगवान्में इस जगत्-प्रसविनी, आवरण करनेवाली मलिना मायाके ही गुणोंका विकास होता, या इसीसे निर्मित उनका शरीर होता तो मायाकी ग्रन्थिको काटे हुए ब्रह्मस्वरूप महात्माओंका उनकी ओर इतना आकर्षण कभी नहीं होता। निर्गुणवादी जिस भगवत्स्वरूपको शुद्ध सच्चिदानन्दघन ब्रह्म कहते हैं और वेद जिसे ‘नेति-नेति’ कहकर संकेतसे समझाना चाहते हैं, वही मायातीत विज्ञानानन्दघन परमात्मा भक्तोंके प्रियतम भगवान् हैं। उनको शान्ति और आनन्दके समुद्र कहनेसे भी उनका यथार्थ वर्णन नहीं होता। उनका जो प्रेम है, वही परम शान्ति और परमानन्दस्वरूप है। इसी प्रेमका वर्णन देवर्षि नारदजी इस सूत्रमें कर रहे हैं। ☐ ☐

भक्तिके साधन और अन्तराय लोकहानौ चिन्ता न कार्या निवेदितात्मलोकवेदत्वात्१ ॥ ६१ ॥ ६१-लोकहानिकी चिन्ता ( भक्तको ) नहीं करनी चाहिये, क्योंकि वह ( भक्त ) अपने-आपको और लौकिक, वैदिक ( सब प्रकारके ) कर्मोंको भगवान्‌के अर्पण कर चुका है। भक्त सब कुछ भगवान्‌के अर्पण कर चुकता है, इसलिये उनके सम्बन्धमें किसी प्रकारकी चिन्ता करनेकी उसे क्या आवश्यकता है ? उसको तो केवल एक प्रियतम भगवान्‌के चिन्तनकी ही चिन्ता रहनी चाहिये। स्त्री, पुत्र, धन, जन, मानादि पदार्थ रहें या चले जायँ, उसे इनकी कोई परवा नहीं; क्योंकि वह तो इन्हें पहले ही भगवान्‌के समर्पण करके सर्वथा अकिंचन हो चुका है। फिर उसके पास इनकी चिन्ता करनेके लिये समय और चिन्ता करनेवाला चित्त भी कहाँ है ? उसके चित्तको तो एकमात्र चिन्ताहरण चिन्तामणिकी चिन्ताने चुरा लिया है। वे चतुर चौरचूडामणि कभी उसके चित्तको वापस देना ही नहीं चाहते, फिर वह चित्तके अभावमें किसी हानिकी चिन्ता ही कैसे करे ? अतएव इस पथके पथिकको लोकहानिकी कोई चिन्ता नहीं करनी चाहिये। उसे तो सबके सार अर्थ श्रीभगवान्‌का ही चिन्तन करना चाहिये। और भक्तके हृदयमें ऐसा ही होता भी है। न तदसिद्धौ२ लोकव्यवहारो हेयः किन्तु फलत्यागस्तत्- साधनं च कार्यमेव ॥ ६२ ॥ १. पाठभेद 'लोकवेदशीलत्वात्' । २. पाठभेद 'तत्सद्धौ' है।