प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार) द्वारा
४. चतुर्थ प्रकरण: एकादश-आसक्ति, भक्ति-विजय एवं उपसंहार (सूत्र ७४-८४)
१४४ प्रेम-दर्शन परस्परानुकथनं पावनं भगवद्यशः। मिथो रतिर्मिथस्तुष्टिर्निवृत्तिर्मिथ आत्मनः॥ स्मरन्तः स्मारयन्तश्च मिथोऽघौघहरं हरिम्। भक्त्या संजातया भक्त्या बिभ्रत्युत्पुलकां तनुम्॥ (श्रीमद्भागवत ११।३।२१-३१) 'जिसको अपना परम कल्याण जाननेकी इच्छा हो, उसे वेदके ज्ञाता और परब्रह्ममें स्थित शान्तस्वरूप गुरुकी शरण जाना चाहिये। और गुरुको ही आत्मा एवं इष्टदेव समझकर निष्कपटभावसे उनकी सेवा करके उन भागवत-धर्मोंको सीखना चाहिये, जिनसे अपने-आपको दे डालनेवाले परमात्मा हरि प्रसन्न हो जाते हैं। मनसे सब विषय-भोगोंमें वैराग्य, साधु-महात्माओंका संग, सब प्राणियोंके प्रति यथायोग्य (दीनोंके प्रति) दया, (समान अवस्था- वालोंसे) मित्रता और (बड़ोंके प्रति विनयका व्यवहार), तन- मन-धनसे पवित्र रहना, कष्ट सहकर भी अपने वर्णाश्रमधर्मका पालनरूपी तप करना, शीत, उष्ण आदिको सहना, व्यर्थ बातचीतका त्याग या भगवान्का मनन, स्वाध्याय, सरलता, ब्रह्मचर्य, अहिंसा, सुख-दुःख आदि द्वन्द्वोंमें समभाव, सर्वत्र सब जीवोंमें अपने- आपको तथा ईश्वरको देखना, एकान्तमें रहना, घर आदिको भगवान्का मानना, शुद्ध साधारण वस्त्र पहनना, जो कुछ भी मिले उसीमें सन्तोष मानना, भगवान्का गुण गानेवाले शास्त्रोंमें श्रद्धा रखना, दूसरे शास्त्रोंकी निन्दा न करना, मन, वाणी और कर्मोंका संयम, सत्यभाषण, मन और इन्द्रियोंको वशमें रखना, अद्भुत लीला करनेवाले श्रीहरिके जन्म, कर्म और गुणोंका श्रवण, कीर्तन और ध्यान करना, भगवान्के लिये ही सब विहित
कर्म करना, यज्ञ, दान, तप, जप आदि सदाचार, अपने प्रिय लगनेवाले सब पदार्थ और स्त्री, पुत्र, घर तथा प्राणोंको भी परमात्माके अर्पण कर देना, और इस प्रकार भगवान् ही जिनके आत्मा और स्वामी हैं ऐसे भक्तोंसे मित्रता करना, जड-चेतन जीवोंकी, मनुष्योंकी और उनमें भी साधुस्वभाववाले महापुरुषोंकी विशेषरूपसे सेवा करना, परस्परमें भगवान्के पवित्र यशका कथन करना और इस भगवद्गुणगानके द्वारा ही परस्पर प्रीति, तुष्टि और दुःखोंकी निवृत्ति करना—ये सब साधन सद्गुरुके समीप रहकर सीखने चाहिये। इस प्रकार बर्ताव करनेवाले और पापसमूहके नाशक श्रीहरिका स्वयं स्मरण करने और दूसरोंसे करानेवाले भक्तोंके हृदयमें इस साधनरूपा भक्तिके द्वारा प्रेमलक्षणा भक्ति उत्पन्न हो जाती है और उनका शरीर पुलकित हो जाता है, वह फिर प्रेममग्न हो जाते हैं।' इस प्रकार श्रीमद्भागवत, श्रीमद्भगवद्गीता, श्रीरामायण आदि भक्तिप्रधान ग्रन्थोंके श्रवण-पठनसे तथा उपर्युक्त प्रकारसे सत्संग, नाम-जप, नाम-कीर्तनादि भक्तिवर्धक सत्कार्योंके भगवत्प्रीत्यर्थ करनेसे भक्तिकी वृद्धि होती है। भक्तको सदा साधुस्वभाव और सत्कार्योंमें ही रत होना चाहिये तभी उनकी भक्ति बढ़ती है। श्रीमद्भगवद्गीतामें भगवान् श्रीकृष्णने अपने प्यारे भक्तोंके लक्षण बतलाते हुए कहा है— अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहंकारः समदुःखसुखः क्षमी॥ सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः। मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥
१४६ प्रेम-दर्शन यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः। हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः॥ अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः। सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥ यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति। शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः॥ समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः। शीतोष्णसुखदुःखेषु समः संगविवर्जितः॥ तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित्। अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः॥ ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते। श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः॥ (१२।१३-२०) 'जो किसी भी जीवसे द्वेष नहीं रखता, जो सबका मित्र और दयालु है, जो ममता और अहंकारसे रहित, सुख- दुःखोंकी प्राप्तिमें समभाववाला और क्षमाशील है, जिसका चित्त निरन्तर मुझमें लगा है, जो सदा सन्तुष्ट है, मन और इन्द्रियोंको जीते हुए है, मुझमें दृढ़निश्चयी है और जिसने अपने मन-बुद्धिको मुझे सौंप रखा है वह मेरा भक्त मुझे प्रिय है। जिससे किसी जीवको उद्वेग नहीं होता और जो स्वयं किसीसे उद्विग्न नहीं होता, जो हर्ष, अमर्ष, भय और उद्वेगोंसे छूटा हुआ है वह भक्त मुझको प्रिय है। जिसको किसी भी वस्तुकी अपेक्षा नहीं है, जो शुद्ध,
भक्तिके प्रधान सहायक १४७ चतुर और उदासीन है, जो दुःखोंसे मुक्त है और 'मैं करनेवाला हूँ' इस अभिमानसे किसी कार्यका आरम्भ नहीं करता (सब कुछ भगवान्का ही किया मानता है) वह मेरा भक्त मुझको प्रिय है। जो न हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है और न कुछ चाहता ही है, जो शुभ और अशुभ किसी भी कर्मको आसक्ति और फलकी इच्छासे नहीं करता वह भक्तिमान् पुरुष मुझको प्रिय है। जो शत्रु-मित्रमें, मान-अपमानमें और सर्दी-गर्मी तथा सुख- दुःखादि द्वन्द्वोंमें समानभाव रखता है, जिसकी (मुझको छोड़कर) किसी भी पदार्थमें आसक्ति नहीं है, जो निन्दास्तुतिको समान समझता है, जो चित्त तथा वाणीसे केवल मेरा ही मनन और कथन करता है और जो किसी भी प्रकार जीवननिर्वाह होनेमें सन्तोष रखता है, जिसका अपना कोई घर नहीं है अर्थात् जो घरमें ममत्वरहित है या जो घर-द्वार सबको भगवान्के मान चुका है वह स्थिरबुद्धि भक्त पुरुष मुझको प्रिय है। जो श्रद्धावान् पुरुष मेरे ही परायण होकर उपर्युक्त धर्ममय अमृतका भलीभाँति सेवन करते हैं वे भक्त तो मुझको अत्यन्त ही प्रिय हैं।' श्रीभगवान्के बतलाये हुए ये लक्षण सिद्ध भक्तोंमें तो स्वाभाविक होते हैं और भक्तिके साधकोंको इन्हें अपना आदर्श मानकर इनके अनुसार आचरण करनेकी चेष्टा करनी चाहिये।
१४८ प्रेम-दर्शन इस प्रकार भक्तिशास्त्रके अध्ययन-मननसे तथा भक्तिको बढ़ानेवाले साधनोंमें लगे रहनेसे भक्तको योगिजनदुर्लभ प्रेमरूपा भक्तिकी प्राप्ति होती है। सुखदुःखेच्छालाभादित्यक्ते काले प्रतीक्ष्यमाणे क्षणार्द्धमपि व्यर्थं न नेयम् ॥ ७७ ॥ ७७-सुख, दुःख, इच्छा, लाभ आदिका (पूर्ण) त्याग हो जाय ऐसे कालकी बाट देखते हुए आधा क्षण भी (भजन बिना) व्यर्थ नहीं बिताना चाहिये। इसमें कोई सन्देह नहीं कि भक्तिकी सिद्धि होनेपर सुख- दुःख, लाभ-हानि आदि सारे द्वन्द्व स्वयमेव मिट जाते हैं और फिर किसी पदार्थकी इच्छा नहीं रहती। परन्तु ऐसे शुभ समयकी केवल बाट ही देखी जाय और साधन कुछ भी न किया जाय तो वर्तमान हीन दशाका विनाश होकर अचानक वैसी शुभ दशा अपने-आप प्राप्त होगी ही कैसे? फिर मनुष्यके जीवनका एक क्षणका भी पता नहीं है, न मालूम किस पलमें प्रलय हो जाय, कब मृत्यु आ जाय; इसलिये 'अमुक स्थिति हो जानेपर भगवान्का भजन करूँगा' ऐसी धारणाको छोड़ देना चाहिये और अभी जो जिस अवस्थामें है, उसे उसी अवस्थामें भगवान्की कृपाका आश्रय करके साधना आरम्भ कर देनी चाहिये। आधे क्षणके लिये भी विलम्ब नहीं करना चाहिये। कबीरजी कहते हैं— काल करै सो आज कर, आज करै सो अब। पलमें परलै होयगी, फेरि करैगा कब॥ पलक मारते-मारते मृत्युके ग्रास बन जाओगे, फिर कब
भक्तिके प्रधान सहायक १४९ करोगे। यह मत समझो कि 'अभी छोटी उम्र है, खेलने- खाने और विषय भोगनेका समय है; बड़े-बूढ़े होनेपर भजन करेंगे।' कौन कह सकता है कि तुम बड़े-बूढ़े होनेसे पहले ही नहीं मर जाओगे। मौतकी नंगी तलवार तो सदा ही सिरपर झूल रही है। इसपर एक दृष्टान्त है। एक भ्रमर था, वह कमलके अन्दर बैठा कमलका रस पी रहा था और उसकी सुगन्धसे मस्त हो रहा था; इतनेमें सन्ध्या हो आयी। सूर्यके छिपते ही कमल संकुचित हो जाता है; अतएव कमल बन्द हो गया और मोटे-मोटे शाल और शीशमके पेड़ोंको छेद डालनेकी ताकत रखनेवाला भ्रमर विषयासक्तिके कारण उसके अन्दर ही रह गया और विचार करने लगा— रात्रिर्गमिष्यति भविष्यति सुप्रभातं भास्वानुदेष्यति हसिष्यति पंकजश्रीः। इत्थं विचिन्तयति कोशगते द्विरेफे हा हन्त हन्त नलिनीं गज उज्जहार॥ 'रात बीत जायगी, प्रातःकाल होगा, सूर्य उदय होंगे और जब उनकी किरणोंके पड़ते ही कमल फिर खिल जायगा, तब मैं इसमेंसे निकल जाऊँगा। इतने आनन्दसे मकरन्दरसका आस्वादन करता रहूँ।' वह यों विचार कर ही रहा था कि इतनेमें एक मतवाले हाथीने आकर कमलको उखाड़कर मुँहमें डाल लिया और कमलके साथ ही भौंरा भी हाथीके दाँतोंमें पिस गया। उसके मनका मनोरथ मनहीमें रह गया। अतएव इन विचारोंको तो छोड़ ही देना चाहिये कि अमुक काम होनेपर भजन करेंगे। प्रथम तो मनमानी कामनाओंकी पूर्ति
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होती ही नहीं और यदि होती है तो एक कामनाकी पूर्ति अनेकों नये-नये अभावोंको साथ लेकर आती है, फिर उनकी पूर्तिके प्रयत्नमें लग जाना पड़ता है। अपूर्ण और अभावमय क्षणभंगुर सांसारिक पदार्थोंसे कभी पूर्ण तृप्ति हो ही नहीं सकती। कितनी ही प्राप्ति हो जाय, रहेगा अभाव ही और अभावके दुःखसे जलते हुए ही विषयकामी मनुष्यको मर जाना पड़ेगा। इसलिये विषयोंकी पूर्ण प्राप्ति और विषयोंके भोगसे पूर्ण तृप्ति हो जाय ऐसे समयकी आशा छोड़कर पहलेसे ही भजनमें लग जाना चाहिये। इसके सिवा एक बात और विचारणीय है कि आज अच्छे संगसे हमारे मनमें भगवान्को या भगवान्की भक्तिको प्राप्त करनेकी इच्छा हुई है और हमने क्षणभरके लिये अपने जीवनका ध्येय भगवत्-प्राप्ति माना है; परन्तु हम विचार करते हैं कि अमुक स्थिति हो जानेपर इस ध्येयकी प्राप्तिके लिये साधन किया जायगा। क्या हमारा यह विचार धोखेका नहीं है? प्रथम तो यही निश्चय नहीं कि अमुक स्थिति प्राप्त हो और फिर यह कौन कह सकता है कि तबतक हमारा ध्येय नहीं बदल जायगा। परन्तु यदि आज हम अपने ध्येय भगवत्प्राप्तिके साधनमें लग जाते हैं तो साधनमार्गमें ज्यों-ज्यों आगे बढ़ेंगे त्यों-त्यों हमारा उसमें विशेष अनुराग होगा, लाभ भी प्रतीत होगा और अभ्यास भी दृढ़ होता जायगा। इसके विपरीत यदि हम केवल ध्येयमात्र मानकर ही चुप रह जाते हैं तो दूसरे ही क्षण, दूसरा संग मिलनेपर हमारा यह ध्येय बदल जायगा। इसलिये कालकी प्रतीक्षा न
भक्तिके प्रधान सहायक १५१ कर अभीसे भजन-साधन आरम्भ कर देना चाहिये। सत्संगसे प्राप्त सदिच्छाके सुअवसरको खो नहीं देना चाहिये। स्वास्थ्य भी सदा अच्छा रहेगा, यह भी निश्चय नहीं है। जबतक स्वास्थ्य ठीक है तभीतक साधन-भजन होता है। स्वास्थ्य बिगड़ जानेपर, इन्द्रियोंके असक्त हो जानेपर और बुढ़ापा आ जानेपर, यदि पहले पूरा अभ्यास नहीं किया गया है तो भजनमें मन ही नहीं लगेगा। महाराजा भर्तृहरिने इसीलिये कहा है— यावत्स्वस्थमिदं कलेवरगृहं यावच्च दूरे जरा यावच्चेन्द्रियशक्तिरप्रतिहता यावत्क्षयो नायुषः। आत्मश्रेयसि तावदेव विदुषा कार्यः प्रयत्नो महान् प्रोद्दीप्ते भवने च कूपखननं प्रत्युद्यमः कीदृशः॥ (वैराग्यशतक) 'जबतक शरीर स्वस्थ है, बुढ़ापा नहीं आया है, इन्द्रियोंकी शक्ति पूरी बनी हुई है, आयुके दिन शेष हैं, तभीतक बुद्धिमान् पुरुषको अपने कल्याणके लिये अच्छी तरह यत्न कर लेना चाहिये। घरमें आग लग जानेपर कुआँ खोदनेसे क्या होगा?' इसीलिये भक्तगण भगवान्के शरण होकर पुकारा करते हैं— आयुर्नश्यति पश्यतां प्रतिदिनं याति क्षयं यौवनं प्रत्यायान्ति गताः पुनर्न दिवसाः कालो जगद्भक्षकः। लक्ष्मीस्तोयतरंगभंगचपला विद्युच्चलं जीवितं तस्मान्मां शरणागतं शरणद! त्वं रक्ष रक्षाधुना॥ 'आयु प्रतिदिन देखते-देखते नष्ट हो रही है, जवानी बीती जा
१५२ प्रेम-दर्शन रही है, गये हुए दिन लौटकर नहीं आते, काल जगत्को खा रहा है, लक्ष्मी जलके तरंगकी भाँति चंचल है और जीवन तो बिजलीकी चमकके समान अस्थिर है; अतएव हे शरण देनेवाले प्रभु! मुझ शरणागतकी तुम अभी रक्षा करो।' कृष्ण त्वदीयपदपंकजपञ्जरान्ते अद्यैव मे विशतु मानसराजहंसः। प्राणप्रयाणसमये कफवातपित्तैः कण्ठावरोधनविधौ स्मरणं कुतस्ते॥ 'हे कृष्ण! तुम्हारे पदकमलरूपी पिंजरेमें मेरा यह मनरूपी राजहंस आज ही प्रवेश कर जाय। प्राण निकलनेके समय जब कफ, वायु और पित्तके बढ़नेपर कण्ठ रुक जायगा, उस समय तुम्हारा स्मरण कहाँसे होगा?' अतएव जरा-सा भी काल भगवान्के भजनके बिना नहीं बिताना चाहिये। जो समय भगवद्भजनमें जाता है वही सार्थक है, शेष सब व्यर्थ है। समयका मूल्य समझकर एक-एक साँसको खूब सावधानीके साथ कंजूसके परिमित पैसोंकी भाँति केवल भगवच्चिन्तनमें ही लगाना उचित है। भजनहीन काल ही वास्तवमें हमारे लिये भयंकर काल है। वही सबसे बड़ी विपत्ति है। कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई। जब तव सुमिरन भजन न होई॥ सा हानिस्तन्महच्छिद्रं स मोहः स च विभ्रमः। यन्मुहूर्तं क्षणं वापि वासुदेवं न कीर्तयेत्॥ 'जो घड़ी या एक क्षण भी श्रीभगवान्के कीर्तन बिना बीत गया उसीको सबसे बड़ा नुकसान, अज्ञान और मोह जानना चाहिये।'
भक्तिके प्रधान सहायक १५३ भगवान्के भजनके लिये किसी भी सुभीतेके समयकी प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिये। नहीं तो हमारा अमूल्य मनुष्यजीवन ही वृथा नष्ट हो जायगा। भगवान्का भजन ही मनुष्यजीवनका सर्वोत्तम और आदरणीय कर्म है। भजन करते-करते भगवान्की कृपासे एक दिन हमारे सारे सुख-दुःखादि द्वन्द्वोंका अपने-आप ही नाश हो जायगा और भगवत्प्रेमकी निर्मल ज्योतिसे हमारा हृदय जगमगा उठेगा; सब दिशाएँ और सारा ब्रह्माण्ड उस निर्मल शीतल स्निग्ध ज्योतिसे भर जायगा और तब हमारे आनन्दकी कोई सीमा नहीं रहेगी। वस्तुतः भक्तका काम तो यह सोचना भी नहीं है कि भजनका क्या परिणाम होगा; उसका काम तो केवल प्रेमपूर्वक भजन ही करना है। प्रेमके लिये ही प्रेम करना है, भजनके लिये ही भजन करना है। भजन करना उसका स्वभाव ही बन जाता है, भजन बिना उससे रहा ही नहीं जाता। वह सब कुछ सह सकता है, किन्तु भजनका वियोग उसके लिये असह्य है। श्रीमद्भागवतमें कहा है— त्रिभुवनविभवहेतवेऽप्यकुण्ठ- स्मृतिरजितात्मसुरादिभिर्विमृग्यात् । न चलति भगवत्पदारविन्दा- ल्लवनिमिषार्धमपि यः स वैष्णवाग्र्यः ॥ (११।२।५३) ‘यदि भगवान्के भक्तसे कहा जाय कि तुम आधे क्षण या आधे निमेषके लिये भी भगवच्चरणोंका चिन्तन छोड़ दो और त्रिलोकीके सम्पूर्ण वैभवको ले लो, तो वह इस बातको स्वीकार
नहीं करता। उसका चित्तरूपी भ्रमर तो अचंचलरूपसे भगवान्के उन चारु चरणकमलोंमें ही लगा रहता है, जिनको निरन्तर ध्यानपूर्वक खोजनेपर भी देवता नहीं पा सकते। ऐसा वह भक्त कुछ भी नहीं चाहता।' वह बार-बार कातर कण्ठसे यही कहता है कि मुझे न मोक्ष चाहिये, न ज्ञान चाहिये, न वैभव चाहिये, न ऋद्धि-सिद्धि चाहिये और न महान् कीर्ति ही चाहिये। किसी भी योनिमें जाना पड़े, कुछ भी हो, इसकी भी तनिक-सी चिन्ता नहीं। बस, हे मेरे प्रियतम ! तुम्हारे चरणोंमें मेरा प्रेम, बिना किसी हेतुका प्रेम, पगला प्रेम, अन्धा प्रेम, प्रेममय प्रेम, प्रियतममय प्रेम दिनोंदिन बढ़ता ही रहे। जनम जनम रति राम पद यह बरदानु न आन॥ श्रीशंकराचार्य जगज्जननीरूप भगवान्से प्रार्थना करते हैं— न मोक्षस्याकाङ्क्षा भवविभववाञ्छापि च न मे न विज्ञानापेक्षा शशिमुखि सुखेच्छापि न पुनः। अतस्त्वां संयाचे जननि जननं यातु मम वै मृडानी रुद्राणी शिव शिव भवानीति जपतः॥ अहिंसासत्यशौचदयास्तिक्यादिचारित्र्याणि परिपाल- नीयानि॥ ७८॥ ७८-(भक्तिके साधकको) अहिंसा, सत्य, शौच, दया, आस्तिकता आदि आचरणीय सदाचारोंका भलीभाँति पालन करना चाहिये। छिहत्तरवें सूत्रमें भक्तिको बढ़ानेवाले कर्मोंका आचरण करनेकी बात कही गयी है। इस सूत्रमें उन क्रियाओं और सद्गुणोंमेंसे पाँच प्रधान आचारोंका नाम निर्देश करके सूत्रकार इनके पालनकी अत्यन्त आवश्यकताका प्रतिपादन करते हैं।
भक्तिके प्रधान सहायक १५५
दैवी सम्पत्तिका गुण भक्तका बाना है। जहाँ भक्ति है वहाँ दैवी सम्पत्तिका होना अनिवार्य है। कुछ लोग भूलसे ऐसा कह दिया करते हैं कि 'भक्ति करो; भक्तमें सद्गुण न हों तो न सही। मनुष्य चाहे जितने पाप करे; बस, भक्त हो जाय; फिर कोई परवा नहीं।' परन्तु उनका यह कथन वैसे ही युक्तिविरुद्ध है जैसे यह कथन कि 'सूर्य उदय हो जाय, फिर वहाँ अन्धकार भले ही बना रहे।' जहाँ सूर्य उदय हो गया, वहाँ अन्धकार न रहकर प्रकाश छा ही जाता है। इसी प्रकार जहाँ भक्तिरूपी सूर्यका उदय हो गया है वहाँ उसका प्रकाशरूप दैवी सम्पत्ति अवश्य फैल जायगी। यह किसी अंशमें सत्य है कि भगवत्प्राप्त महात्मा भक्त पुरुषोंके बाहरी आचरणोंसे उनकी परीक्षा नहीं होती। परन्तु कुछ गुण तो ऐसे हैं ही जिनका उनमें प्रकट रहना अत्यन्त ही आवश्यक है। आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य है। उन्हीं गुणोंमें ये पाँचों गुण भी हैं। जिस पुरुषमें ये गुण न हों, वह यदि कदाचित् साधु या भक्त भी हो तो भी उससे डरना ही चाहिये। बल्कि अधिकांशमें तो इन गुणोंसे रहित मनुष्य साधु या भक्त होते ही नहीं। अपनी परीक्षा तो साधकको इन्हीं गुणोंके आधारपर करनी चाहिये। यह निश्चय रखना चाहिये कि यदि भगवान्का चिन्तन और दैवी सम्पत्ति बढ़ रही है तो हमारी भक्तिमार्गमें उन्नति हो रही है; यदि जगत्का चिन्तन होता है और दैवी सम्पत्ति नहीं बढ़ रही है तो हमारी उन्नति नहीं हो रही है एवं यदि विषयोंका चिन्तन बढ़ रहा है और आसुरी सम्पत्ति बढ़ रही है तो हमारी निश्चय ही अवनति हो रही है। भगवान्का प्रेमपूर्वक चिन्तन भक्तका धर्म है और दैवी सम्पदाके गुण उसकी जीवनपद्धति है। वह सब कुछ
१५६ प्रेम-दर्शन छोड़ देता है, परन्तु इन दोनोंको नहीं छोड़ता। अवश्य ही लीलामय भगवान्की आज्ञा या रुचिके अनुसार सिद्ध भक्तको कहीं-कहीं जीवनपद्धति बदलनी पड़ती है। परन्तु वह नियम नहीं है, अपवाद है। यह निश्चय है कि वह किसी प्रकारकी भी आसक्ति, ममता, कामना, वासना, अहंकार या मोहवश जीवन- पद्धतिको नहीं बदलता। जहाँ किसी कारणवश किसी समय उसकी जीवनपद्धतिमें और उसके स्वाभाविक स्वधर्म भगवत्प्रेममें विरोध आता दीखता है, वहीं भगवान्की आज्ञा लेकर वह अपने स्वधर्मकी रक्षाके लिये नीतिको छोड़ देता है। ऐसे ही स्थलोंके लिये—भरत, प्रह्लाद, विभीषण, श्रीगोपीजन आदिके उदाहरण मिलते हैं, जहाँ उन्होंने भगवान्के लिये माता, पिता, भाई और पति आदिकी आज्ञाओंका उल्लंघन किया है। परन्तु वहाँ भी देखा जाय तो सदाचार-नीतिका त्याग नहीं हुआ है। प्रेमधर्मके पालनार्थ भक्तोंने प्रायः स्वयं ही कष्ट सहा है। उस अवस्थाकी बात दूसरी है जिसमें सारे विधि-निषेधोंका भगवान्के चरणोंमें समर्पण हो जाता है। परन्तु स्मरण रहे, वह समर्पण होता है, किया नहीं जाता। विधि-निषेधोंका बोझ उस बावले भक्तके सिरसे उतार लिया जाता है, वह जानकर नहीं उतारता और उस मस्तीमें भी उसमें कोई दुर्गुण रहता हो सो बात नहीं है। परन्तु यहाँ तो साधककी चर्चा हो रही है और साधकको बड़ी ही सावधानीके साथ शास्त्रविहित सद्गुणों और सदाचारोंका रक्षण और पालन करना चाहिये। सूत्रकारने जिन पाँच गुणोंका नाम लिया है उनका स्वरूप संक्षेपमें यों समझना चाहिये। अहिंसा—शरीर, मन और वाणीसे किसी भी जीवको
भक्तिके प्रधान सहायक १५७ किसी प्रकारसे वर्तमान या भविष्यमें दुःख नहीं पहुँचाना, वरं सदा सबको सुखी बनानेकी चेष्टामें लगे रहना। **सत्य—**जैसा देखा, सुना या समझा हो, वचन, लेखन या संकेतसे ठीक वैसा ही दूसरेको समझानेकी नीयत रखना। वाणीसे ऐसे ही शब्दोंका उच्चारण करना जो सत्य हों और साथ ही मधुर और हितकारी भी हों। कुछ लोग सत्यभाषणमें कठोर भाषाका प्रयोग आवश्यक समझते हैं और अभिमानवश कह बैठते हैं कि हम तो सत्य कहनेवाले हैं, चाहे उससे किसीका जी दुःखी हो या सुखी! परन्तु ऐसी बात नहीं है। द्वेष, वैर, निन्दा, चुगली आदि भावोंसे बचाकर वाणीको अपने और दूसरेके हितकी दृष्टिसे सदा मधुरता और सत्यमें ही सनी रखनी चाहिये। जैसे चन्द्रमाकी चाँदनी प्रकाश देनेवाली होनेके साथ ही शीतल भी होती है, इसी प्रकार भक्तकी वाणी भी सत्य और मधुर— प्रकाशक और शान्तिदायक होनी चाहिये। जिससे दूसरेका अहित होता हो वह सत्य भी वांछनीय नहीं है। **शौच—**बाहरी और भीतरी दोनों प्रकारके शौचकी आवश्यकता है। बाहरी— (क) जल, मिट्टी आदिसे शरीरको पवित्र रखना। (ख) दूसरेका स्वत्व न छीनकर सत्यतापूर्वक निर्दोषरूपसे कमानेकी चेष्टा कर धनको शुद्ध रखना। (ग) शुद्ध स्थानमें शुद्ध स्नान किये हुए मनुष्यद्वारा, शुद्ध निरामिष अन्नसे बनाये हुए पदार्थोंको भगवदर्पण कर भोजनको शुद्ध करना। (घ) शुद्ध, निष्कपट और प्रेमपूर्ण बर्तावसे व्यवहारको शुद्ध रखना।
१५८ | प्रेम-दर्शन
(ङ) अतिथिसत्कार और भगवन्नामकी ध्वनिसे घरको पवित्र रखना। (च) शास्त्रविहित आचरणोंसे अन्य सभी बाह्य कर्मोंको शुद्ध रखना। भीतरी— दम्भ, वैर, अभिमान, आसक्ति, ईर्ष्या, द्वेष, शोक, पापचिन्तन, व्यर्थ विषयचिन्तन आदि दोषोंको मनमें यथासाध्य न आने देकर सरलता, प्रेम, विनय, वैराग्य, अद्वेष, प्रसन्नता, सच्चिन्तन और भगवच्चिन्तनके द्वारा मनको पवित्र रखना। दया— दुःखी मनुष्य घरका या दूसरा हो, मित्र हो या शत्रु हो, उसको दुःखकी दशामें देखकर बिना किसी भेदभावके मनका व्याकुल हो जाना और यथासाध्य कष्ट सहकर तथा त्याग करके भी उसके दुःखको दूर करनेकी चेष्टा करना। यह भाव सभी जीवोंके प्रति होना चाहिये और सभी कालमें होना चाहिये। जिस क्रियासे जीवोंका अहित होता हो और उन्हें दुःख पहुँचता हो, उन क्रियाओंको त्याग देना चाहिये। इसी प्रकार देश या समाजमें जिन प्रथाओं और कृत्योंसे जीवोंका अहित होता हो, उन्हें बन्द करानेकी चेष्टा करनी चाहिये। आस्तिकता— ईश्वर और शास्त्रोंपर प्रत्यक्षकी तरह पूर्ण विश्वास होना चाहिये। भगवान् हैं, सर्वव्यापी हैं, सर्वेश्वर हैं, सर्वशक्तिमान् हैं, सर्वज्ञ हैं, परम दयालु हैं, परम सुहृद् हैं, भक्तवत्सल हैं, दीनबन्धु हैं और सदा सर्वत्र विराजमान हैं, इन बातोंपर विश्वास करते ही सारे पाप-ताप अपने-आप ही नष्ट हो जाते हैं। भगवान्में विश्वास करनेकी आवश्यकता सबसे पहले और सबसे अधिक है। भगवान्के अस्तित्व और उनके प्रभाव
भक्तिके प्रधान सहायक १५९ तथा गुणोंपर विश्वास हो जायगा तो मन स्वतः ही भगवान्की ओर लग जायगा। मनुष्यको जो कुछ चाहिये, भगवान् सभीके भण्डार हैं। ज्ञान चाहिये, भगवान् ज्ञानस्वरूप हैं; प्रेम चाहिये, भगवान् प्रेममय हैं; आनन्द चाहिये, भगवान् आनन्दघन हैं; वैराग्य चाहिये, भगवान् परम विरागमय हैं; धन चाहिये, धनकी स्वामिनी लक्ष्मीजी अपनी चंचलताको छोड़कर निरन्तर उनकी चरणसेवा करती हैं; ऐश्वर्य चाहिये, सारा जगत् उन्हींके ऐश्वर्यके एक कणका प्रकाश है; यश चाहिये, यशकी धारा वहींसे निकलती है; सारांश यह कि संसारमें हम जो कुछ भी सौन्दर्य, माधुर्य, प्रेम, स्नेह, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, धन, भोग, सुख आदि देखते हैं और इन सब वस्तुओंके सम्बन्धमें जहाँतक हमारी ऊँची-से-ऊँची कल्पना होती है वह सब कुछ भगवान्के एक क्षुद्र अंशमें ही रह जाता है। हमारे इस जगत्के पदार्थ और पदार्थोंकी हमारी कल्पना उस अखिल सौन्दर्य, माधुर्य, ऐश्वर्यादि सद्गुण-सागरकी एक बूँदकी भी बराबरी नहीं कर सकती। जो इस प्रकार भगवान्को जान लेता है और विश्वास कर लेता है, वह भगवान्को छोड़कर आधे क्षणके लिये भी दूसरी ओर मन नहीं लगा सकता और न वह जगत्के क्षणिक भोगोंके उदय और विनाशमें हर्ष और शोकको ही प्राप्त होता है। अवश्य ही आस्तिकतामें विश्वास सच्चा होना चाहिये। भगवान्की सत्ताके विश्वासमें हमें प्रह्लादका इतिहास सदा याद करना चाहिये। हिरण्यकशिपुकी आज्ञासे सैकड़ों-हजारों दुर्दान्त दानव बड़े-बड़े अस्त्र-शस्त्र लेकर प्रह्लादको मारने दौड़ते हैं। वह कहता है—
१६० प्रेम-दर्शन विष्णुः शस्त्रेषु युष्मासु मयि चासौ व्यवस्थितः। दैतेयास्तेन सत्येन माक्रमन्त्वायुधानि च॥ (विष्णुपुराण १।१७।३३) ‘अरे दैत्यो! मेरे भगवान् विष्णु इन शस्त्रोंमें भी हैं, तुमलोगोंमें भी हैं और मुझमें भी हैं, वे सब जगह हैं। इस परम सत्यके प्रभावसे तुम्हारे इन शस्त्रास्त्रोंका मुझपर कोई असर न हो!’ दैत्योंके शस्त्र व्यर्थ हो गये, उनके आघातसे प्रह्लादको तनिक भी वेदना नहीं हुई। विषधर सर्पोंमें और उनके विषमें, विशालकाय मतवाले हाथियोंमें और उनके वज्रके समान दाँतोंमें भी प्रह्लादने अपने भगवान्को देखा। प्रह्लादका उनसे कुछ भी नहीं बिगड़ा। प्रह्लादको आगमें डाला गया, अग्निमें उसे भगवान्की नवनीलनीरदमूर्ति दिखायी दी। उसने कहा— तातैष वह्निः पवनेरितोऽपि न मां दहत्यत्र समन्ततोऽहम्। पश्यामि पद्मास्तरणास्तृतानि शीतानि सर्वाणि दिशाम्मुखानि॥ (विष्णुपुराण १।१७।४७) ‘हे तात! पवनसे प्रेरित यह अग्नि भी मुझे नहीं जलाता। मुझको तो सभी दिशाएँ ऐसी शीतल प्रतीत होती हैं, मानो मेरे चारों ओर कमलके पर्दे टँगे हों।’ प्रह्लादको मारनेके लिये पुरोहितोंने ‘कृत्या’ उत्पन्न की और जब प्रह्लादको मारनेमें निष्फल होकर कृत्याने पुरोहितोंको ही मार डाला, तब प्रह्लाद बोले—
भक्तिके प्रधान सहायक १६१ यथा सर्वेषु भूतेषु सर्वव्यापी जगद्गुरुः। विष्णुरेव तथा सर्वे जीवन्त्वेते पुरोहिताः ॥ यथा सर्वगतं विष्णुं मन्यमानोऽनपायिनम्। चिन्तयाम्यरिपक्षेऽपि जीवन्त्वेते पुरोहिताः ॥ (वि० पु० १।१८।४०-४१) 'सर्वव्यापी जगद्गुरु भगवान् विष्णु सब प्राणियोंमें व्याप्त हैं, इस सत्यके प्रभावसे ये पुरोहित जीवित हो जायँ। यदि मैं सर्वगत और अक्षय विष्णुभगवान्को मुझे मारनेकी चेष्टा करनेवालोंमें भी देखता हूँ तो ये पुरोहित जी जायँ।' प्रह्लादकी दृढ़ आस्तिकतासे पुरोहित जी उठे। अन्तमें हिरण्यकशिपुके पूछनेपर प्रह्लादने बड़ी दृढ़ताके साथ, अडिग निश्चयसे, छाती ठोंककर कहा—'हाँ, मेरे प्रभु सर्वत्र हैं, इस खम्भेमें भी हैं।' अपने सेवकके इस वाक्यको प्रत्यक्ष सत्य करनेके लिये भगवान् खम्भेको चीरकर प्रकट हो गये। कैसा निश्चय और कैसा अद्भुत परिणाम! यह है आस्तिकता। भक्तोंको यथासाध्य आस्तिक बने रहनेकी और आस्तिकतामें निरन्तर अग्रसर होनेकी चेष्टा करनी चाहिये। सूत्रकारने 'आस्तिक्य' के साथ 'आदि' शब्द जोड़कर दैवी सम्पदाके अन्यान्य दैवी गुणोंकी ओर संकेत किया है। श्रीमद्भगवद्गीतामें दैवी सम्पत्तिके ये छब्बीस गुण बतलाये गये हैं। भगवान् कहते हैं— अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः। दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्॥ अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम्। दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम्॥
१६२ प्रेम-दर्शन तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता। भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत॥ (१६।१-३) 'हे भारत! निर्भयता, अन्तःकरणकी शुद्धि, भगवान्के स्वरूपमें निरन्तर दृढ़ स्थिति (आस्तिकता), दान, इन्द्रियसंयम, यज्ञ, स्वाध्याय, तप, सरलता, अहिंसा, सत्य, क्रोधहीनता, त्याग, शान्ति, किसीकी निन्दा या चुगली न करना, सब प्राणियोंपर दया, लोभरहित होना, कोमलता, ईश्वर और शास्त्रविरुद्ध कर्मोंमें लज्जा, अचंचलता, तेज, क्षमा, धैर्य, शौच, अद्रोहता और अभिमानशून्यता—ये सब गुण दैवी सम्पदाको प्राप्त हुए पुरुषमें रहते हैं। यह दैवी सम्पत्ति भक्तमें ही रहती है। इसीलिये भक्तोंको 'देव' कहा गया है। द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन् दैव आसुर एव च। विष्णुभक्तः* स्मृतो दैव आसुरस्तद्विपर्ययः॥ (पद्मपुराण) 'इस जगत्में दो प्रकारके जीव हैं। एक दैव और दूसरे आसुर। जो भगवान्के भक्त हैं, वह दैव हैं, जो भक्त नहीं हैं, वही आसुर हैं।' सर्वदा सर्वभावेन निश्चिन्तैर्भगवानेव भजनीयः ॥ ७९ ॥ ७९-सब समय सर्वभावसे निश्चिन्त होकर (केवल) भगवान्का ही भजन करना चाहिये। यह सूत्र बड़े ही महत्त्वका है। इसमें देवर्षिने प्रेममार्गी भक्तके भगवद्भजनका बड़ा ही सुन्दर प्रकार बतलाया है। वास्तवमें जो *—यहाँ 'विष्णुभक्त' शब्दसे शास्त्रानुसार भगवान्के किन्हीं भी नामरूपका सात्त्विक भक्त समझना चाहिये। भगवान्के नामरूपोंमें भेद मानना तो अपराध ही माना गया है।
भक्तिके प्रधान सहायक १६३ पुरुष भगवान्के दिव्य गुण, रहस्य और प्रभावको यथार्थरूपसे जान लेता है; जानना दूर रहा, सन्तोंद्वारा सुनकर उसपर विश्वास कर लेता है, वह भगवान्को छोड़कर किसी भी कालमें मन-वाणी-शरीरसे दूसरा काम नहीं कर सकता। भगवान् शंकर कहते हैं— उमा राम सुभाउ जेहिं जाना। ताहि भजनु तजि भाव न आना॥ दरिद्र मनुष्यको कहीं पारस मिल जाय तो वह दूसरी ओर क्यों ताकेगा? एकमात्र भगवान् ही परतत्त्व हैं, भगवान् ही सबकी गति हैं, भगवान् ही सर्वाधार हैं, भगवान् ही सर्वशक्तिमान्, सकल दिव्य गुणनिधान, सौन्दर्य, माधुर्य और ऐश्वर्यकी निधि, ज्ञान और वैराग्यके स्वरूप, आनन्द-कन्द-विग्रह हैं और इतना सब होते हुए भी वे हमारे परम सुहृद् हैं, हमें गले लगानेके लिये सदा हाथ पसारे खड़े-खड़े हमारी बाट देखा करते हैं—इस बातको जान लेनेपर सकामी या अकामी, विषयी या मुमुक्षु, साधक या सिद्ध, कौन ऐसा पुरुष है जो भगवान्को छोड़कर एक क्षणार्धके लिये भी दूसरेको भजे? हम नहीं भजते, इसका कारण यही है कि हमने उनके प्रभावको जाना नहीं है। सुना है तो उसपर विश्वास नहीं किया है। देवर्षि कहते हैं कि विश्वास करो और निरन्तर मन-वाणी-शरीरसे केवल उन्हीं परम प्रियतम भगवान्का भजन करो; मनसे सारी चिन्ताओंको दूर कर दो। समस्त चिन्तनोंसे चित्तको मुक्त कर दो। जैसे छोटा शिशु माँकी गोदमें जाकर निश्चिन्त हो जाता है, ऐसे ही प्रभुके दास बनकर निश्चिन्त हो जाओ। जिसके रखवारे राम हैं; उसे किस बातकी चिन्ता होनी चाहिये। सब कुछ छोड़कर, सबकी आशा त्यागकर, भगवान्के सामने सबको तुच्छ मानकर, उस दिव्यातिदिव्य मधुर