नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०२ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता यह सामग्री वस्त्र, पुष्पादि की मालाएं, गन्ध, धूप, भूषणादि तथा भक्ष्य भोज्यादिरूप में होती है अतः प्राप्त ऐसी सभी सामग्री को श्रीनारायण को बिन निवेदित या अर्पित किये उनका उपभोग या ग्रहण नहीं करन चाहिए।।७२।। वेदवेदाङ्गतत्वज्ञो वेदान्तपरिनिष्ठितः । मीमांसान्याय-निपुणो धर्मशास्त्रविशारदः ॥७३॥ इतिहासपुराणज्ञः पञ्चरात्रार्थतत्ववित् । परं भगवदैकान्त्यं ज्ञात्वा धर्मं समाचरेत् ॥७४॥ अतएव वेद तथा वेदाङ्गों के तत्वों का पूर्ण ज्ञान करनेवाला, वेदान्तादि शास्त्रों में पारंगत, मीमांसा तथा न्याय शास्त्रों में निपुण विद्वान्, धर्मशास्त्रादि का पूर्णज्ञाता, इतिहास तथा पुराणों का अनुशीलन किया हुआ तथा पांचरात्र आदि वैष्णवागमों के तत्वों का विशेषज्ञान रखनेवाला विद्वान् नारायण की अनन्यता को समझ कर स्वधर्म का पालन करे।।७३-७४।। सर्वसंस्कारसंस्कारो ज्ञानं भागवतं परम् । तत्संस्कृता हि संस्काराः कल्पन्ते मुक्तिहेतवः ॥७५॥ भगवद्विषयक ज्ञान परमोत्तम है क्योंकि वही सभी वर्णाश्रमनियत संस्कारों का अतिशय आपादक संस्कार होता है तथा अतिशय संस्कृत रूप के कारण (यह ज्ञान संस्कृत संस्कार) मुक्ति में कारणभूत हो जाते हैं। (इसलिए भगवद्विषयक ज्ञान ही सर्व संस्कारभूत है)।।७५।। परमात्मा हरिः स्वामी स्वतोऽहं तस्य किङ्करः । कैङ्कर्यमखिला वृत्तिरित्येष ज्ञानसङ्ग्रहः ॥७६॥ भागवत ज्ञान को यदि संग्रह रूप में देखें तो यह है कि समस्त आत्माओं के अन्तरात्मास्वरूप परमात्मा हरि ही स्वामी हैं तथा अहंवृत्तिवेद्य प्रत्यगात्मरूप में स्वयं इन हरि का दासभूत किंकर मैं हूं तथा मेरे सभी वृत्तिभूत व्यापार कैंकर्यभूत हैं यही इसका संग्राहक संग्रह है।।७६।। नित्यमर्चाजपध्यानस्नानदानव्रतादिकम् । विशुद्धमेव कर्तव्यमनन्यैर्न विमिश्रितम् ॥७७॥ (वृत्ति के विहिताचारों में) नित्य ही इष्टदेव श्रीहरि की अर्चना करना, निष्ठा मन्त्र का नित्यजप, उनका ही स्मरणरूप ध्यान धरना, नित्य स्नान, दान तथा एकादश आदि साम्प्रदायिक व्रत उपवास आदि रखना, ये सभी अर्चादि तत्व तथ एकान्तीभाव से विशुद्धरूप में करना चाहिए। अर्थात् अन्य देवगण की अर्चनादि