नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दीटीकासहित १०१ यदि प्रातःकाल, मध्याह्न तथा सायंकाल त्रिसन्ध्य वेला में ऊर्ध्वपुण्ड्र ही शरीर पर धारण किया जाए (और अन्य नित्यादि कर्मों के अनुष्ठान में कमी भी आ जाए) तो भी श्रीनारायण की प्रीति रहने से ऐसे प्रत्यवाय की शान्ति शीघ्र हो जाती है।।६६।। प्रभाते दिव्यलोकस्थं मध्याह्ने चार्कमध्यगम् । तोषयन्त्यूर्ध्वपुण्ड्रेण सायं स्वात्मगतं हरिम् ॥६७॥ यदि प्रभातकालमें ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करे तो दिव्यलोक स्थित श्रीनारायण की मध्याह्नकाल में आदित्य में स्थित नारायण की तथा सायंकाल आत्मस्थ नारायण की प्रसन्नता प्राप्त होती है।।६७।। सन्तः सतोऽनुगृह्णन्ति दर्शनादेव लक्ष्मभिः । त्यजन्त्यन्ये तदुभयं मुख्यमैकान्त्यकारणम् ॥६८॥ वैष्णव सन्त चक्रादि चिन्हों को देखने मात्र से उन्हें आत्मीय समझ कर उन पर अनुग्रह करते हैं तथा जो असन्त या अवैष्णवजन हैं वे इन वैष्णव चिन्हों को देखते ही उनसे दूर हट जाते हैं। ये दोनों ही एकान्त्य भाव में कारणभूत होते हैं अतः लक्ष्म (चिन्ह) तथा ऊर्ध्वपुण्ड्रादि का धारण आवश्यक है।।६८।। क्रमाप्तभगवन्मन्त्रः कल्पविच्छुद्धमानसः । धृतोर्ध्वपुण्ड्रश्चक्रादिलाञ्छितो हरिमर्चयेत् ॥६९॥ सम्प्रदाय (के क्रम) के अनुसार दीक्षित होकर भगवन्मन्त्र को प्राप्त कर मन्त्र तथा भगवतस्समाराधन के विधान को जानकर ऊर्ध्वपुण्ड्र को धारण कर चक्रादि लक्ष्म से युक्त रहकर वैष्णव श्रीनारायण की अर्चना करे।।६९।। यथापूर्वाकृतिन्नित्यान् मुक्ताँश्चैव यथागमम् । यथावतारदेहञ्च पूजयेद्धरिमिच्छया ॥७०॥ श्रीहरि का अर्चन पञ्चरात्र आगम के अनुगत यथावत् आकृति में युक्त तथा नित्यरूपवाले अवतार के अनुरूप देहादि विग्रह वाले श्री हरि की ध्यानादि के पश्चात् अपनी इच्छा के अनुरूप विधिवत् अर्चना करे।।७०।। अवैष्णवाद्द्वैष्णवाद्वा चेतनं वाप्यचेतनम् । यदवाप्तं समस्तं तद्विष्णवे विनिवेदयेत् ॥७१॥ वैष्णव अथवा अवैष्णव से प्राप्त होनेवाली चेतना चेतनात्मक भाव की जो भी सामग्री प्राप्त हो उस सभी को श्रीनारायण को अर्पित कर उन्हें निवेदित करे।।७१।। वासः स्रग्गन्धभूषादि भक्ष्यभोज्यादिकं तथा । न किञ्चिदुपभोक्तव्यमनिवेद्य श्रियः पतेः ॥७२॥