नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
पृष्ठ 102, कुल 176 में से
संदर्भ में पढ़ें१०० नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता आराधकजन अपने इष्ट श्रीहरि को अपने ध्यानयोग के द्वारा मन्त्र के जपस्म अनुष्ठान के द्वारा क्रमशः युगों में तुष्ट करते हैं। (इनमें कृतयुग में ध्यान, त्रेतायुग मन्त्र योग, द्वापर में पूजन तथा कलियुग में चक्राद्यंकन कार्य नारायण की प्रसन्नता अतिशय आपादक है। यह तत्व दिखलाया गया) ॥६१॥ अष्टमात् षोडशाद्वाद्वा धार्यं चक्रादिभूषणम् । प्रतप्तैरङ्कनं पश्चात् सदा वा भूषणं स्त्रियः ॥६२॥ आठ वर्ष की आयु से लेकर सोलह वर्ष की आयु तक का काल विहित रहने से इसने चक्रादि पञ्च आयुध के भूषण का धारण किया जा सकता है। (जो ब्राह्मण के उपनयनकाल का आरम्भ तथा गौण उपनयन का अन्तिम अवधि का काल है) इन मुहूर्त में प्रतप्त चक्रादि से अंकन किया जावे, अथवा स्त्रीजन के लिये भी इनका सद धारण या भूषणरूप में इनका धारण भी अभीष्ट (होता) है॥६२॥ शिष्यपुत्रकलत्राणां भृत्यानाञ्च गवामपि । कुर्यादचेतनानाञ्च वैष्णवं नाम लक्ष्म च ॥६३॥ इसके अतिरिक्त अपने शिष्य, पुत्र, भार्या तथा अपने सेवकजन का तथा अपने द्वारा संगृहीत पशु में गौ आदि का तथा अचेतनभूत स्वगृह तथा अन्य पदार्थों का नाम भी श्रीविष्णु से सम्बन्ध रखना चाहिए तथा इनमें चेतन जीवों के शरीर पर चक्रादि क अंकन भी करवाना चाहिए॥६३॥ आमा ह्यतप्ततनवस्तप्ताङ्गाः हरिलाञ्छनैः । सुभृता भोग्यतां प्राप्य भुज्यन्ते परमात्मना ॥६४॥ जो शरीर तप्तचक्र से अंकित नहीं किये गये वे अपक्व या पापों को दग्ध न करनेवाले होते हैं तथा श्रीहरि के चिन्ह चक्रादि से तप्ताङ्ग होने पर उनके सभी पातक दग्ध हो जाने से परमात्मा श्रीहरि के द्वारा भोगयोग्य होकर उनके द्वारा उपभोग के योग्य बन जाते हैं॥६४॥ ऊर्ध्वपुण्ड्रान्तरालस्थाँश्चक्रादीन् धारयेत् सदा । बहिष्कृता ह्यतिक्रुद्धाः पदात् प्रच्यावयन्ति ते ॥६५॥ इसलिये शरीर पर उचित प्रदेशों पर चक्रादि चिन्ह तथा ऊर्ध्वपुण्ड्र को सदा धारण करना चाहिए (चक्रादि चिन्ह से अंकित या ऊर्ध्वपुण्ड्रादि पूर्व निर्दिष्ट स्थानों प धारण करते हैं)। यदि इन चक्रादि तथा ऊर्ध्वपुण्ड्रादि का धारण कर इन्हें उपेक्षित करेंगे तो वे उन्हें अपने स्थान से गिरा देंगे॥६५॥ प्रातर्माध्यन्दिने सायमूर्द्धपुण्ड्रेण केशव । अकृतैर्वापि सुकृतैस्तैस्तैः प्रीणाति कर्मभिः ॥६६॥