नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
पृष्ठ 101, कुल 176 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दीटीकासहित ९९ स्थानों पर श्रीगरुड़ध्वज विष्णु उसके समीप आकर उसको करुणावश विष्णुलोक में ले जाते हैं॥५६॥ न जन्मनो नाध्ययनान् न यज्ञान्न तपःश्रमात् । न त्यागादश्नुते ब्रह्म गुरूपसदनं विना ॥५७॥ उपदेष्टा आचार्य की सेवा का आश्रय ही मुख्य है। अतः इसके बिना यदि ब्राह्मणादि उत्तमवर्ण में जन्म हो जाने से या वेदादि शास्त्रों के अध्ययन सम्पन्न हो जाने से, यज्ञादि अनुष्ठानों के कराने से तथा विरक्तिभाव से इन्द्रियादि के विषयों का त्याग करने से भी ब्रह्म की प्राप्ति (मोक्ष की प्राप्ति) नहीं हो सकती॥५७॥ देहकृन्मन्त्रविन्न स्यान्मन्त्री संस्कारकृत् परः । तौ च नात्मविदौ स्यातामन्यस्त्वात्मविदात्कृत् ॥५८॥ यदि जन्म प्रदान करनेवाला पिता ही मन्त्र का प्रदाता भी हो जाए ऐसी कभी स्थिति नहीं हो पाती है क्योंकि जो मन्त्रवेत्ता विद्वान है वही उपनयन आदि संस्कार का सम्पादन करनेवाला आचार्य नहीं हो पाता है और पिता तथा सँस्कार और मन्त्र का संपादन करनेवाला आचार्यरूप में रहकर भी ये ब्रह्म या आत्मतत्व के विद्वान् नहीं हो पाते। अतः यदि ब्रह्मवेत्ता पिता ही मन्त्रवेत्ता हो तो वहीं संस्कार का सम्पादन करनेवाला आचार्य भी होना उचित है॥५८॥ न चक्राद्यङ्कनं नेज्या न ज्ञानं न विरागता । न मन्त्रः पारमैकान्त्यं तैर्युक्ता गुरुवश्यता ॥५९॥ केवल चक्रादि का शरीर पर अंकन मात्र और न ही इष्ट के प्रति उपपादित यज्ञादि, न केवल दृष्टि या ज्ञान तथा न ही वैराग्य भाव, न दीक्षा में प्राप्त मन्त्र ही 'पारमैकान्त्यम्' होता है। किन्तु इन सभी के साथ अपने मन्त्रादि उपदेष्टा आचार्य (गुरु) के अधीन रहकर भगवदाराधना कर्म ही 'पारमैकान्त्य' होता है॥५९॥ विद्या विभूषणं पुंसस्तस्या वृत्तं विभूषणम् । विष्णुभक्तिर्विभूषाऽस्य सा चक्राद्यङ्कभूषणा ॥६०॥ पुरुष की विद्या के अर्जन से प्राप्त दृष्टि अलंकार या भूषण होती है और विद्या से विहित वृत्त या आचार विभूषण होता है। इस वृत्त का विभूषण श्रीनारायण की भक्ति है तथा इसका विभूषण शरीर पर श्रीविष्णु के चक्रादि का अंकन (कार्य) होता है॥६०॥ ध्यानेन मन्त्रयोगेन पूजनेनाङ्कनेन च । तोषयन्ति जगन्नाथं वासुदेवं युगक्रमात् ॥६१॥