भारतकोश
नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary

महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

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९८ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता है॥५०॥ मरणं जन्मने यस्य मरणायैव केवलम् । तेषां भगवदैकान्त्यविमुखा ये नराधमाः ॥५१॥ और जो भगवच्चरणों से विमुख एकान्त्य रहित ब्राह्मणादि वर्ण है उनका जन्म केवल मरण के लिये होता है तथा मरण भी केवल मरण के लिये होता है तथा मरण भी केवल पुनर्जन्म के लिये होता है और बाद में ये भी मनुष्यों में हीन स्थिति के ही रखनेवाले बन जाते हैं (तथा ये मोक्ष से वंचित हो जाते हैं)॥५१॥ न विद्या केवलार्थाय नाचारो नार्चनं हरेः । न चक्राद्यङ्कदेहत्वं विना भागवतार्चनम् ॥५२॥ श्रीहरि के अर्चन का कार्य न करने पर उनकी प्राप्त की गयी विद्या भी व्यर्थ है, उनकी आचारनिष्ठता तथा चक्रादि का शरीर पर धारण करना भी बिना श्रीहरि के अर्चन के साथ भागवतजन की सत्सेवारूप अर्चन भी निरर्थक होता है॥५२॥ न प्रपत्तेः परा विद्या न विष्णोर्देवतं परम् । न तद्दास्यात् परा सिद्धिर्न गुरुर्वैष्णवात् परः ॥५३॥ क्योंकि श्रीहरि की प्रपत्ति के 'न्यास-योग' से श्रेष्ठ कोई विद्या नहीं है तथा श्रीविष्णु से उत्तम कोई अन्य देवता नहीं। उनकी दास्यता प्राप्ति से उत्तम कोई सिद्धि नहीं होती तथा वैष्णवजन से उत्तम दूसरा कोई आचार्य या गुरु भी नहीं होता॥५३॥ नित्यमच्युतभक्तानां कुर्यात् पादावनेजनम् । नम्रः समुपभुञ्जीत सर्वपातकनाशनम् ॥५४॥ अतएव जो श्रीविष्णु के परमभक्तजन वैष्णव हों तो उनके नित्य पाद प्रक्षालन करना चाहिए तथा ऐसे चरणतीर्थ जल का विनम्रभाव से सेवन करना सभी पातकों का विनाश करनेवाला होता है॥५४॥ वैष्णवस्याङ्कशय्यायां वैष्णवस्य गृहेऽपि वा । देशे वा तद्विचरिते संस्थिता यान्ति सद्गतिम् ॥५५॥ यदि किसी वैष्णव की गोद में अन्तिम समय मस्तक रखकर या किसी वैष्णव के गृह में अथवा श्रीवैष्णव के द्वारा संचालित भूमि या स्थान पर स्थित रहकर यदि प्राण निकले तो उसकी सद्गति हो जाती है॥५५॥ यत्र क्वाप्यथवा देशे वैष्णवो म्रियते यदा । तदा तत्राशु सान्निध्यं करोति वृषभध्वजः ॥५६॥ और वैष्णव भक्त जहाँ कहीं भी स्थित रहकर अपना प्राण छोड़ता है तो उन सभी