भारतकोश
नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary

महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

पृष्ठ 99, कुल 176 में से

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पृष्ठ 99

हिन्दीटीकासहित ९७ करनेवाला हो तो उसे भी 'प्रच्युत' ही समझना चाहिए॥४४॥ अपि चेत् सेवनपरो न चेत्तापादिसंस्कृतः । अनर्चार्हतया विष्णोर्दास्यात् प्रच्यवते ध्रुवम् ॥४५॥ और यदि भागवतजन की सेवा में रत होकर भी जो तापादि चक्रांकित रूप से संस्कार प्राप्त न किया हुआ हो तो उसे श्रीनारायण की अर्चना करने का अधिकार न मिलने से वह भी निश्चितरूप से श्रीविष्णु के दास्यभाव से पतित हो जाता है (श्रीविष्णु की भक्ति का अधिकारी भी नहीं रह पाता है)॥४५॥ यस्तु प्राप्य गुरोर्विद्यां नार्चयेत् पुरुषोत्तमम् । प्रणमेदन्यदेवाय न स भागवतः स्मृतः ॥४६॥ जो उत्तम आचार्य से विद्या की शिक्षा तथा मन्त्रादि की दीक्षा प्राप्त करने पर भी श्री पुरुषोत्तम की अर्चना (नित्य) नहीं करे और अन्य देवताओं की प्रणामादि अर्चना करता हो तो वह भी भांगवतजन या वैष्णव नहीं है॥४६॥ ये नात्मानमनात्मानं विद्याविद्ये फलाफले । उपास्यमनुपास्यञ्च वेत्ति भागवतो न सः ॥४७॥ जो आत्मा तथा अनात्मा का, विद्या और अविद्या का, फल और फल विरोधी अफल का तथा इष्ट एवं उपास्य देव तथा अनुपास्य देवता का भेद न समझता हो तो उसे भी भागवतजन या वैष्णव नहीं समझना चाहिए॥४७॥ देवतानाञ्च याथात्म्यं कैङ्कर्यस्य हरेरपि । अविदित्वाऽऽचरन् कर्म विहीनां गतिमश्नुते ॥४८॥ जो अग्नि तथा इन्द्र आदि देवगण का भगवद् देह भाव तथा श्रीहरि के किंङ्करभाव को न जानकर कर्म, वर्ण तथा आश्रम में अपने नियतकर्मों का आचरण करते हुए न रहे तो वह भी प्रच्युत है तथा उसे भी सद्गति प्राप्त नहीं होती है॥४८॥ देवर्षिभूतात्मतया त्यजन् केवलमेव वा । विष्णुं तत्तत्फलाकाङ्क्षी पारमैकान्त्यतश्च्यवेत् ॥४९॥ और जो देव तथा ऋषियों के यजनादि कर्मों को नियत विधि से सम्पन्न करते हुए तथा उनमें केवल विष्णु का अर्चन कर उससे कार्य के फल की इच्छा रखे तो वह भी परमैकान्त्य-भाव से च्युत (होता) है॥४९॥ तेषां न परिशुद्धानि योनिविद्याञ्च कर्म वा । ये विष्णुचरणैकान्त्यविहीना ब्राह्मणादयः ॥५०॥ जिनको श्रीविष्णु के चरणों से एकान्त्य प्राप्त नहीं है वे ब्राह्मणादि वर्ण की योनि (वर्ण या जाति में) उत्पत्ति विद्या तथा कर्मों को परिशुद्ध नहीं माना जाता

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