भारतकोश
नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary

महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

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९६ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता नहीं करना चाहिए तथा स्वयं भी श्रीहरि को समर्पित प्रसादादि अन्न को किसी अवैष्णवजन को प्रदान नहीं करना चाहिए॥३९॥ ये त्ववैष्णवभर्त्तव्या ये चावैष्णवभर्तृकाः । एकान्त्यस्योपघातेन न तैः कर्माप्यनापदि ॥४०॥ आपत्ति की स्थिति को छोड़कर यदि जिनका पालन किया जा रहा हो ऐसे पुत्र, स्त्री आदि के वैष्णव न रहने या जो पालन करनेवाले पिता माता आदि भी वैष्णव न हों तो अनैकान्ती भाव के उपघात हो जाने से इनसे भी कार्य तथा सम्बन्ध को दूर रखे और आपत्काल में इसे पालनयोग्य न समझे॥४०॥ त्यक्ताचारस्त्यक्तदृष्टिस्त्यक्तार्थस्त्यक्तलक्षणः । त्यक्ताचार्यस्त्यक्तमन्त्रः प्रत्येकं प्रच्युतो नरः ॥४१॥ अब प्रच्युत का स्वरूप बतलाते हैं कि जो वैष्णवानुमत वृत्ति के आचारों को पालन न करता हो, जिसने दृष्टि (नामक अवयव) का ध्यान न रखा हो, जो वैष्णवार्थ में भक्ति आदि का सम्यक् ज्ञान न रखता हो तथा जो ऊर्ध्वपुण्ड्र आदि धारण के भगवत् चिन्हों का परित्याग करता हो तो उसे 'प्रच्युत' समझना चाहिए, जो कि अपने मन्त्रादिकों के प्रदाता गुरु तथा उनके दिये गए मन्त्रों का भी परित्याग कर देता हो॥४१॥ पातकेन कुदृष्ट्यान्त्यभजनेनान्यलक्षणैः । अवैष्णवोपसत्यान्यमन्त्रेणाऽपि च्यवन्ति वै ॥४२॥ विहित आचार के विरुद्ध आचरण के पातक से, दृष्टि विरुद्ध अन्य देवता के भजन तथा भक्ति करने से, अन्य लक्ष्म के धारण करने से तथा अवैष्णवजन की संगति के कारण सत्सेवा न करने से और अन्य देवता के मन्त्र को लेने के कारणों में प्रत्येक की स्थिति में वह पतित या 'प्रच्युत' हो जाता है॥४२॥ यो दिव्यशास्त्रमन्त्रेषु कुरुते त्ववधीरणाम् । तथान्यशास्त्रमन्त्रेषु प्रसक्तिं न स वैष्णवः ॥४३॥ जो पञ्चरात्रागमादि प्रोक्त दिव्यशास्त्रीय मन्त्र तथा इन शास्त्रों के मन्त्रों की अवधीरणा करे तथा अन्य शास्त्रों के प्रति श्रद्धा या आसक्ति रखने लगे तो वह 'वैष्णव' नहीं माना जाता है॥४३॥ सर्वैश्च लक्षणैर्युक्तो नियतश्च स्वकर्मसु । यस्तु भागवतान् द्वेष्टि सुदूरं प्रच्युतो हि सः ॥४४॥ और जो पूर्व में दिखलाये गये सभी लक्षणों से युक्त हो, अपने कर्म तथा आचार में जो निष्ठा रखता हो किन्तु जो भागवतजन से द्वेष करनेवाला या उनका तिरस्कार