नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
पृष्ठ 97, कुल 176 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दीटीकासहित ९५ अज्ञैः कुदृष्टिभिर्बाह्यैर्नास्तिकैः संशयात्मभिः । न तु भागवतः किञ्चित् प्रच्युतैश्च समाचरेत् ॥३४॥ ऐसे लोग जो शास्त्रज्ञान से रहित हैं, जो वेद को प्रमाण मान कर भी उसकी प्रतिपत्ति से विपरीत व्याख्या करते हैं, जो नास्तिक बुद्धि वाले तथा संशयात्मा पुरुष हैं तथा जो तन्त्रादि आगम के व्रतधारी हों तो ऐसे पुरुषों के साथ भागवत वैष्णव कुछ भी आचरण या संसर्ग न रखें॥३४॥ तुल्याभिजनचारित्रा बान्धवास्तुल्यदृष्टयः । आपाद्य दृष्टयोऽपि स्युर्न कदापि कुदृष्टयः ॥३५॥ और जो बाह्य तथा अन्तररूप में कुल तथा वृत्ति में समानता रखते हों, जो ज्ञानादि में भी बराबर समान हों, ऐसे बान्धवजन यदि आपत्ति में इन पूर्वोक्त आचारों से हीन (विपरीत भाववाले) भी हो जाएं तो ऐसे बान्धवजन बाद में कुदृष्टि नहीं होते (या यदि वैसे ही हो तो वे बान्धव नहीं होंगे)॥३५॥ विवाह-यज्ञाध्ययन-स्पर्श-संवास-भोजनम् । एकान्तिनान्तु कर्त्तव्यं तादृशैः सह बान्धवैः॥३६॥ विवाह, यज्ञादि अनुष्ठान, अध्ययनकाल, स्पर्श, साथ में निवास करना तथा भोजनादि कर्मों में उपयुक्त व्यवहार वाले अपने सम्बन्धी या कुल के व्यक्तियों के साथ भी भागवत अथवा एकान्तीजन को भी सम्बन्ध रखना चाहिए या काम बनाये रखना चाहिए॥३६॥ सतामनवकाशत्वात् कालांशेषु न लौकिकम् । तस्मादलौकिकैरेव सकलं कर्म कारयेत् ॥३७॥ अपने इष्टदेव के पांच निर्धारित समयों में आराधना से ही रहने के कारण इनके काल भागों में लोकयात्रा या सम्बन्धीजन से सम्पर्क या व्यवहार का समय ही नहीं होगा। अतएव इस समय लोकयात्रा से विमुख अतिरिक्त समय के अंशों में ही इनसे कार्य रखे या इनका कार्य करवाए॥३७॥ समित्पुष्पहविस्तोयपात्रोपनयनादिषु । अवैष्णवान् विशेषेण न कर्मसु नियोजयेत् ॥३८॥ जैसे यज्ञीय अपेक्षा से समिधाओं, पुष्पपल्लवादि, जल-पात्रों का लाना जैसे कार्यों में विशेषरूप से जो अवैष्णवजन हों तो उनकी नियुक्ति नहीं की जाती है॥३८॥ नोपभोक्तव्यमन्नाद्यमवैष्णवनिवेदितम् । नावैष्णवाय दातव्यं स्वयं विष्णोर्निवेदितम् ॥३९॥ किसी अवैष्णवजन से अर्पित या निवेदित स्वादु अन्नादि का उपभोग या अशनादि