भारतकोश
नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary

महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

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९४ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता हे मुनिजन! अब सात्विक गुणोंवाले श्रीनारायण के सात्विक उपासकों के स्वरूप को बतलाता हूं। इनका श्रीनारायण के दास्यभाव को प्राप्त कर मुक्ति प्राप्ति ही फल है तथा भगवान् ही इस प्राप्ति के उपायभूत आधार होकर अंग भी हो जाते हैं (अतः इस प्रकार श्रीहरि ही मोक्ष के प्रति उपाय तथा उपेय हैं) ।।२९।। तदाज्ञाकरणे प्रीतिस्तत्कर्मगुणकीर्तनम् । तच्चिह्नाङ्कितदेहत्वं तदीयाराधने रतिः ।।३०।। इन सात्विक उपासकों को अपने नित्य तथा नैमित्तिक अनुष्ठानों में भगवदाज्ञारूपी वचनों के पालनादि में प्रीति रखना है तथा उनके कर्मों तथा गुणों का कीर्तन करना, उनके चक्रादि चिन्हों से शरीर को अंकित करना तथा उनकी आराधना में ही रति रखना कार्य हो जाते हैं।।३०।। तदन्यस्पर्शवैराग्यमिन्द्रियार्थेष्वलोलता । आचार्याधीनवृत्तित्वमाचार्यार्थार्थवृत्तित्ता ।।३१।। उन्हें भगवन्नारायण के अतिरिक्त अन्य जन के स्पर्शादि तक से विराग हो जाता है तथा इन्द्रियादि के भौतिक आलम्बनों के प्रति लोलुपता नहीं रहती। इनकी कार्यादिवृत्ति भी अपने आचार्यों के प्रति अर्पित होकर उनके अधीन रहती है तथा आत्मवृत्ति भी आचार्यादि के अर्थों के प्रति ही रहनेवाली हो जाती है।।३१।। क्रोधलोभमदालस्यमानमोहविहीनता । सत्यशौचदयाधैर्यक्षमासन्तोषयुक्तता ।।३२।। और वे क्रोध, लोभ, मद, आलस्य, मान तथा मोह से रहित हो जाते हैं। तब उनमें सत्य,, शौच, दया, धैर्य, क्षमा तथा सन्तोष के भाव स्वतः ही उत्पन्न हो जाते हैं।।३२।। इत्येतैल्लक्षणैर्युक्ता वैष्णवा वीतकल्मषाः । सभाज्या दर्शनेनैव नावज्ञेयाः कदाचन ।।३३।। इस प्रकार इन लक्षणों से युक्त वैष्णव भक्त रहते हैं जो अतिशय पवित्र तथा निष्कल्मषरूप वाले हैं। ऐसे वैष्णवजन के दर्शन प्राप्त होने पर पूज्यभाव से उनकी सम्भावना करनी चाहिए तथा इनकी न तो उपेक्षा ही करना चाहिए और न तिरस्कार करना चाहिए।।३३।। १ ऐसे साधक भक्त 'श्रुतिस्मृती ममैवाज्ञे' मानकर ईशवचन का अनुगमन करते हैं। तथा आचार्य को भी उसी श्रीपति के रूप में रखते हुए अपनी वृत्ति में अवस्थित रहते हैं। यथा-'शरीरं प्राणवत् पश्येदन्नं प्राणविलेपनम् । प्राणाभावेन न च तावनन्दस्तन्तु प्राणवत् ।।'