भारतकोश
नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary

महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

पृष्ठ 95, कुल 176 में से

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पृष्ठ 95

हिन्दीटीकासहित ९३ त्रिभिः प्रजापतेर्भक्तः सप्तभिः शङ्करस्य तु । विंशत्याग्नीन्द्रसूर्यादिर्जन्मभिर्वैष्णवो भवेत् ॥२४॥ प्रजापति ब्रह्मा का आराधक भक्त तीन जन्मों के बाद शंकर का भक्त सात जन्मों के बाद तथा अग्नि, इन्द्र, सूर्य आदि का उपासक बीस जन्मों के बाद वैष्णव भक्त के रूप में जन्म लेता है॥२४॥ न सांख्येन न योगेन शैवेनापि न तत्पदम् । यदौपनिषदैः प्राप्यं पञ्चरात्रविशारदैः ॥२५॥ रजस्तमो मूलक दर्शनादि के अनुगमन से मोक्ष प्राप्ति का विचार कर कहते हैं कि यह मोक्ष कपिलादि प्रणीत सांख्य-शास्त्र के तथा पातञ्जल या हिरण्यगर्भीय योग-शास्त्र के, पाशुपतादिमत के शैवागम के अनुगमन या सिद्धांतों के मानने पर वैसा (मोक्ष) प्राप्त नहीं होता जैसा कि उपनिषद् के सिद्धान्तों के अथवा पञ्चरात्र-आगम के विद्वानों के अनुगमन करने पर सहज ही प्राप्त हो जाता है॥२५॥ एकैकं वापि नैकान्ती भजेन्नैकान्त्यलक्षणम् । कालेनैकान्त्यमाप्नोति नरो विगतकल्मषः ॥२६॥ मनुष्य इन पूर्व कथित मार्गों में से एक का भी अनुसरण करते हुए अन्य देवता की उपासना करे तो भी समय आने पर या जन्मादि की अवधि के पश्चात् विगतकल्मष या पवित्रता प्राप्त कर वहीं एकान्ती विष्णु भक्त होकर अन्त में परम मोक्ष को प्राप्त कर लेता है॥२६॥ नारायणैकनिष्ठा ये सात्विकास्तान् निबोधत । पुरुषा राजसा ज्ञेया नानादैवतयाजिनः ॥२७॥ अतः जो भगवान् श्रीहरि के एकान्त भक्त या तन्निष्ठ हैं वे सात्विक-आराधक हैं तथा जो अनेक देवताओं के आराधक तथा अर्चानादिकारी हैं वे पुरुष राजस-आराधक कहलाते हैं॥२७॥ बाह्या निर्देवताश्चैव तामसाः परिकीर्तिताः । रजस्तमोऽभिभूतानां न तु मोक्षः कथञ्चन ॥२८॥ वे पुरुष जो किसी देवता की आराधना ही नहीं करते हों तो ऐसे निरीश्वरवादी तामस तथा बाह्यजन हैं। राजस तथा तामस गुणों से अभिभूत जन को (अन्यदेवतादि के आराधन करने के कारण) मोक्ष प्राप्ति नहीं होती है॥२८॥ मुनयः सत्वनिष्ठानां लक्षणानि निबोधत । विष्णोर्दास्यैकफलता तदेकोपायता स्थितिः ॥२९॥

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