नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
पृष्ठ 94, कुल 176 में से
संदर्भ में पढ़ें९२ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता तात्त्विकज्ञान से अनभिज्ञ हैं॥१८॥ अपरत्वेन चाप्येता ये यजन्ति हि देवताः । तेषां भवति नैकान्त्यमतो नैवाप्नुयुः परम् ॥१९॥ और जो दूसरे पक्ष के विद्वान् हैं तथा जो इन्हें अपररूप या स्थिति में अर्चित करते या उपास्य मानते हैं तथा देवतारूप में उनकी यज्ञादि धर्म कार्यों से उपासना करते हैं उनका एकान्त्यभाव नहीं बनता। अतः वे परं निःश्रेयस् भाव को (मोक्ष को) प्राप्त नहीं कर सकते॥१९॥ अङ्गभावेन शुद्धानामर्चा प्रियतमा हरेः । या स्वतन्त्रधिया तत्र सा निहन्ति विविक्तताम् ॥२०॥ परन्तु शुद्धभाववाले नित्यमुक्त अनन्तादि की अङ्गभाव में (अमुख्यरूप से भी) अर्चना करना श्रीहरि को अत्यन्त प्रिय होती है परन्तु यदि यज्ञादि क्रियाएं किसी (अन्य देवता) की स्वतन्त्र निष्ठा से की जाए तो उससे भगवन्निष्ठा तथा एकान्त्यभाव को क्षति पहुँचने के कारण यह कार्य निषिद्ध माना जाता है॥२०॥ भावनानान्तु कालुष्यादशुद्धिः कर्मणां भवेत् । तस्मात्तेषां विशुद्धयर्थं विष्णुमेव सदा भजेत् ॥२१॥ तथा ऐसे कर्म में भावना के कलुषित हो जाने के कारण कर्म भी शुद्धरूप में नहीं होते हैं। अतएव समस्त कर्मों की विशुद्धि के लिये सदा श्रीहरि की ही उपासना करनी चाहिए॥२१॥ बाह्यः सदसतां नास्ति भेदः प्रायेण कर्मसु । सङ्कल्पादेव भिन्नानि स हेतुर्बन्धमोक्षयोः ॥२२॥ जो भक्त एकान्ती हैं उनके कर्म में प्रायः बाह्य-भेद नहीं माना जाता है (किन्तु संकल्प के कारण ही भिन्नता वाले सन्तों के कर्म भगवत्-प्राप्ति पर्यन्त फलाग्रह से रहित होते हैं) यह भेद प्रायः कर्मों में तथा संकल्प से भिन्नता रखता है तथा यही बन्धन एवं मोक्ष का कारण बनता है (असत् संकल्प बन्ध का तथा सत्संकल्प मोक्ष का हेतु बनता है)॥२२॥ यजेच्छुद्धानशुद्धान् वा साम्यात् पारम्यतोऽपि वा । लभते विविधान् कामान् विभोस्तस्यैव शासनात् ॥२३॥ शुद्ध तथा अशुद्ध के साम्य या परमता के आधार पर यजन (अर्चना) को किया जाता है जो ऐसी विविध कामनाओं को दिलवाता (प्राप्त करवाता) है जो कि परमेश श्रीविष्णु के अनुमत या शासन से होती है (किन्तु इनसे मोक्ष नहीं प्राप्त होता है)॥२३॥