भारतकोश
नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary

महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

पृष्ठ 106, कुल 176 में से

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पृष्ठ 106

१०४ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता यास्तत्र तत्र श्रूयन्ते पुंसां काम्यतया श्रुतौ । ताः किलैकान्तिना दिव्या भगवद्भोगसम्पदः ॥८३॥ वेदादि में जो जो क्रियाएं पुरुषों के लिये काम्यरूप में बतलाई गयी है एकान्ती वैष्णव विद्या से विशुद्ध ऐसी दिव्य क्रियाओं को श्रीनारायण की अभिमत या प्रियरूप में भगवदाराधनरूप किंकरभाव से सम्पन्न होकर सम्पादन करे॥८३॥ आरम्भे कर्मणां सिद्धयै विघ्नानां प्रशमाय च । कुर्यात् सपरिवारस्य विष्वक्सेनस्य पूजनम् ॥८४॥ इन क्रियाओं के आरम्भ में कर्म की सिद्धि के लिये तथा विघ्नों की शान्ति के लिए विष्वक्-सेन श्रीविष्णु का परिवार सहित पारम्परिक अर्चन करना चाहिए॥८४॥ स्वल्पापि हन्ति भूयांसं स्वधर्मं निन्दिता क्रिया । दृष्टिं कुदृष्टिर्भक्तिन्तु देवतान्तरसम्भवः ॥८५॥ थोड़ी भी इष्टादि की निन्दा से युक्त किया बड़े से बड़े धार्मिक अर्चनादि के अनुष्ठानों का विघात कर देती है तथा अश्रद्धा या कुदृष्टि अपने इष्ट की गौण दृष्टि का तथा ऐसी भक्ति अन्य देवता को उपासना का आश्रय ग्रहण करती है॥८५॥ सत्सेवनमसत्सेवा लक्षणं चान्यलक्ष्माता । तस्माद् विरुद्धान्येकान्ती विशेषेण विवर्जयेत् ॥८६॥ और जैसे असत् सेवा सत्सेवा का विघात करती है इसी तरह अन्य देवताओं के चिन्हभूत (तिलकादि का) धारणरूप लक्ष्म से अपना लक्ष्य विनष्ट हो जाता है अतः विरुद्ध कार्यभूत ऐसे लक्ष्मादि का धारण अनन्य या एकान्ती वैष्णव को नहीं रखना चाहिए॥८६॥ एकस्यापि हि धर्मस्य विनाशे च विरोधिभिः । अनन्वयापचारेण नश्यत्येकान्तिवृत्तिता ॥८७॥ एक भी विहिताचारावि संपन्न धर्म की विरोधी भूत निन्दित क्रियाओं के अनुष्ठान से नष्ट हो जाने पर धर्म के न करने पर दोष से एकांती वृत्ति का विनाश हो जात है॥८७॥ परमैकान्तिनां धर्मः कृते पूर्णः प्रवर्तते । क्षीयमाणः क्रमेणायं कलौ स्यास्यन्ति वा न वा ॥८८॥ परमैकान्तितारूप धर्म कृतयुग में पूर्णरूप में स्थित रहेगा तथा युगादि क्रम में क्रमशः

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