नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दीटीकासहित १०५ क्षीण होते हुए यही परमैकान्तिता धर्म कलियुग आने पर स्थित रहेगा अथवा नहीं (अर्थात् कलियुग में यह नैष्ठिक धर्म विरलरूप में हो जाएगा) ॥८८॥ नानाकामह्तज्ञाना नानादैवतयाजिनः । नरा भगवदैकान्त्ये न स्थास्यन्ति कलौ युगे ॥८९॥ अनेक कामना या अभिलाषाओं को रखने से जिनकी बुद्धि नष्ट हो गयी हो, ऐसे लोग जो अनेक देवगण का इष्ट रखते हुए उनकी पूजा करनेवाले होते हैं वे मनुष्य कलियुग में भगवदेकान्त्य कि परमैकान्त्यभाव में स्थित नहीं रहेंगे॥८९॥ परं भागवतं वर्त्म दृष्ट्वापि कलिमोहिताः । प्रभवन्ति न विद्वांसस्त्यक्तुं पूर्वान्धवर्त्मनीम् ॥९०॥ कलियुग के प्रभाव से मोह को प्राप्त ऐसे मनुष्य परमश्रेष्ठ भागवत मार्ग को जानने वाले एवं विद्वान् होकर भी वे अपने पूर्वजों के द्वारा अनुसृत एवं रूढ़ मार्ग को छोड़ने में समर्थ नहीं होंगे॥९०॥ भविष्यन्ति कलौ केचित् क्वचिदेकान्तिनो हरेः । मोहयिष्यन्ति च परे कुतकैँस्तान् कुदृष्टयः ॥९१॥ अतएव कलियुग में श्रीनारायण के भक्तिभाव से एकान्ती-जन किसी स्थान पर कुछ ही बचे होंगे। (अल्पमात्रा में ही प्राप्त होंगे) और उन्हें भी कुछ तार्किक या हेतुवादी जन अपनी अपनी बुद्धि से किये गये कुतर्कों से भटका कर मोह में डाल देंगे (भ्रान्त बना डालेंगे) ॥९१॥ निरीश्वराः कर्मफला निष्क्रिया ब्रह्मवादिनः । परावरविमूढाश्च भविष्यन्ति कलौ युगे ॥९२॥ उस समय कलियुग में कर्मादि अनुष्ठान में लगे हुए तथा ईश्वर की भक्ति न करनेवाले नास्तिकजन होंगे और कुछ ब्रह्मवादीजन क्रियादि-अनुष्ठान से हीन (राहुमीमांसक) होंगे तथा कुछ पर (श्रेष्ठ) तथा अपर (हीन) ज्ञान से रहित होंगे॥९२॥ क्षीणायुर्ज्ञानशक्तित्वान्मनुष्याणां कलौ युगे । विद्यानां परमा विद्या न्यास एव परायणम् ॥९३॥ कलियुग में जब पुरुषों की आयु क्षयशील या अल्पायु रहने से बहुकाल साध्य उपाय करने में अशक्त होने तथा ज्ञानशक्ति के भी क्षीण या अल्प रहने के कारण उस समय विद्याओं में उत्तम विद्या कहलाने वाला केवल 'न्यासयोग' ही उनके लिये उपयुक्त उपायभूत (सहायक) होगा (अन्य दूसरा कोई नहीं) ॥९३॥