नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०६ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता कर्म ज्ञानञ्च भक्तिश्च साधनानि मनीषिणाम् । न्यास एवाचिरात् सिद्धिं वाञ्छतां सर्वदेहिनाम् ॥९४॥ ज्ञानीजन के कर्म, ज्ञान तथा भक्तियोग ही साध्यभूत मोक्ष के साधन (द्वारभूत) माने गये हैं परन्तु सभी शरीरधारी प्राणियों के लिये शीघ्र सिद्धि को देनेवाला केवल एक 'न्यास-योग' ही है॥९४॥ ज्ञानानन्दमयो नित्यः शुद्धो देहान्तरं हरेः । जीवोऽयं संसरत्यस्य माययैव विमोहितः ॥९५॥ यह ज्ञान तथा आनन्दमय स्वरूपवाला जीव जो नित्य तथा शुद्ध श्रीहरि का दूसरा शरीरभूत माना जाता है परन्तु यह उसी हरि की अधीन माया से विमोहित होकर जन्म मृत्यु के चक्र में घूमता रहता है ॥९५॥ अनीश्वरोऽहमीशोऽहमिति धीर्मायया हरेः । भवेत् सा संसृतेर्मूलं तं प्रपद्यैव तां त्यजेत् ॥९६॥ मेरा कोई ईश्वर नहीं अथवा मैं ईश से रहित या उसे न माननेवाला हूं अथवा मैं ही ईश्वर हूँ ऐसी श्रीहरि की माया से विमोहित होने पर बुद्धि हो जाती है। यही बुद्धि संसार का मूल है अतः श्रीहरि की प्रपत्ति का न्यासयोग धारण कर इस माया का अन्त किया जाता है जिससे माया का त्याग (मोहनाश) संभव होता है॥९६॥ ज्ञानानन्दमयोऽनन्तो दिव्यात्मगुणविग्रहः । नारायणो जगद्योनिः प्राप्यो लक्ष्मीपतिः स्वयम् ॥९७॥ इस प्रकार नारायण भगवान् जो ज्ञान तथा आनन्दमय रूपवाला है, जो दिव्य आत्मा, गुण तथा शरीर वाला है जो संसार की सृष्टिका आधार है वही लक्ष्मीपति स्वयं ही प्राप्य हो जाता है॥९७॥ आब्रह्मलोकाल्लोकानां यदैश्वर्यं न तद्ध्रुवम् । अथ नित्यं महत्साधु यद्दास्यं परमात्मनः ॥९८॥ (सृष्टिकर्ता ब्रह्मदेव के) ब्रह्मलोक से लेकर सभी सातों लोकों का जो ऐश्वर्य या सम्पत्ति है वह सभी स्थिर रहनेवाली (शाश्वत) नहीं है। केवल जो नित्य, महान् तथा उपयुक्त वस्तु है वह परमात्मा श्रीहरि की दास्यभाव में स्थिति ही है॥९८॥ एवं-विधस्वधर्मेण युक्तस्यानन्यचेतसः । नित्यमाराधनं विष्णोर्यत् तद्दास्यमिहोच्यते ॥९९॥ अतएव इस प्रकार अपने नित्य तथा नियत दास्य धर्म में अवस्थित रहनेवाले तथा