भारतकोश
नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary

महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

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हिन्दीटीकासहित १०७ एकान्ती (अनन्य चित्तवाले) का जो नित्य ही श्रीहरि की आराधना में रत (दास्य भाव में स्थित) रहना है वही 'दास्य' या कैङ्कर्य भाव है॥९९॥ अनुज्ञाताः स्त्रियश्चैवमर्चयन्त्यो जगद्गुरुम् । यथार्हमपि शूद्राद्याः सर्वे यान्ति परां गतिम् ॥१००॥ इति श्रीनारदपञ्चरात्रे भारद्वाजसंहितायाः परिशिष्टे प्रथमोऽध्यायः ॥१॥ भगवान् के आराधना कर्म दास्यभाव में स्थित होकर उनकी अर्चना करने में स्त्री शूद्र आदि को भी आचार्यों ने मान्यता दी है।अतएव इस प्रपत्ति को उपयुक्त रूप में प्रयुक्त या अनुष्ठित करनेवाले ये स्त्री शूद्रादि सभी जन परमगति मोक्ष को प्राप्त कर लेते हैं॥१००॥ नारदपञ्चरात्रे भारद्वाजसंहितायां परिशिष्टे प्रथमोऽध्यायः समाप्तः नारदपञ्चरात्र में भारद्वाजसंहिता के परिशिष्ट के प्रथमाध्याय की तत्वप्रकाशिका नामक हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण