भारतकोश
नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary

महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

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१०८ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता परिशिष्टे अथ द्वितीयोऽध्यायः उपासितगुरोर्वर्षं विष्णोर्दास्यमभीप्सतः । विहिताः पञ्च संस्कारा युक्तस्यैकान्त्यहेतवः ॥१॥ अथ परिशिष्टे द्वितीयोऽध्याय श्रीनारायण के दास्यभाव की इच्छा रखनेवाला अधिकारी एक वर्ष तक पूर्ण निष्ठा से अपने प्रपत्तिदाता आचार्य की सेवाशुश्रूषादि उपासना करे। तब शिष्य के गुणों के उपयुक्त उसे एकान्तीभाव के कारणभूत पांच विहित संस्कार (जो बतलाये हैं उन्हें) वह आचार्य सम्पन्न करवाए॥१॥ तापः पुण्ड्रं तथा नाम मन्त्रो यागश्च पञ्चमः । अमी हि पञ्च संस्काराः पारमैकान्त्यहेतवः ॥२॥ ये पांच संस्कार है-चक्रादि से संतप्त कर अंकन रूप ताप, ऊर्ध्व पुण्ड्र का धारण, नाम-करण, मन्त्र-ग्रहण तथा पंचम है याग। ये पाच संस्कार गर्भाधानादि संस्कारों से विशिष्ठ है तथा इनसे शीघ्र ही मोक्षप्राप्तिका आधार ऐकान्तीभाव प्राप्त होता है॥२॥ तापयिष्यन् गुरुः शिष्यं चक्राद्यैर्हेतिभिर्हरेः । पुण्येऽह्नि नियतः स्नात्वा स्नातं मन्त्रजलाप्लुतम् ॥३॥ ऋचा दक्षिणतः कुर्याद् वैष्णव्या बद्धकौतुकम् । ततः समर्चेयेद देवं स्वार्चायां स्थण्डिलेऽपि वा ॥४॥ सर्वप्रथम आचार्य किसी पवित्र तिथि को नियमपूर्वक स्नान कर फिर मन्त्रोचार पूर्वक तीर्थादि पवित्र जल में स्नान किये हुए शिष्य को श्रीनारायण के चक्र आदि आयुधों को अग्नि में तपाकर उन्हें वैष्णवी ऋचा 'विष्णोर्नु के वीर्याणि' (शुक्ल यजु०) का उच्चारण कर शिष्य के दाहिने बाजू में स्थापित करे या बिठलावे। इस कार्य को व्यवस्थित रूप में करने के पश्चात् अपने इष्टदेव की स्थापित स्थण्डित पर या किसी बाह्यबिम्ब (प्रतिमा) में अर्चना करे॥३-४॥ पश्चिमे स्वेन मन्त्रेण कृत्वाग्नेः स्थापनादिकम् । मूलमन्त्रेण हुत्वाज्यं ततः प्रत्यक्षरारुहुतीः ॥५॥