नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दीटीकासहित १०९ एकां पुनश्च सर्वेण पौरुषोभिश्श्च षोडश । हुत्वा त्रीन् विष्णुगायत्र्या वैष्णव्या चाथ हेतिभिः ॥६॥ तदनन्तर श्रीहरि से पश्चिमभाग में स्थण्डिलादि पर अग्नि की स्थापना आदि कर्म सम्पन्न कर मूल मन्त्र के द्वारा आज्याहुति प्रदान कर फिर मन्त्र के प्रत्यक्षरों से आहुति करे और फिर अष्टाक्षर मन्त्र से एक आहुति देकर पुरुषसूक्त के षोडश मन्त्रों से सोलह आहुति देकर विष्णुगायत्री-'नारायणाय विद्महे' इत्यादि से तीन आहुति देवे और श्रीविष्णु के आयुधभूत पांच मन्त्रों से आहुति देवे॥५-६॥ हविर्निवेद्य देवाय तच्छेषेण तथाहुतीः । अथोपसन्ने हैमानि ताम्राणि राजतानि वा ॥७॥ प्रक्षाल्य पञ्चगव्येन मन्त्रतोयाप्लुतानि च । बिम्बानि पूर्वहेतीनां स्वभागनिहितानि वै ॥८॥ निधाय वह्नौ प्रत्येकं तत्रावाह्य स्वमन्त्रतः । अर्घ्यं पाद्यं तथाचम्यं गन्धं पुष्पञ्च धूपकम् ॥९॥ दीपञ्च दत्वाथाभ्यर्च्य प्रणम्याग्निसमप्रभम् । आचार्यः स्वयमादाय नियुक्तो वाऽथ मन्त्रवित् ॥१०॥ प्राङ्मुखस्योपविष्टस्य न्यसेद् बाहौ च दक्षिणे । सुदर्शनं तथा वामे पाञ्चजन्यं स्वमन्त्रतः ॥११॥ इसके पश्चात् अर्चित इष्टदेव को शेष हवि अर्पित कर उसके शेष भाग से आज्याहुति उसी विधिक्रम में प्रदान करे। इसके पश्चात् समीप में रखी हुई स्वर्ण निर्मित, ताम्रनिर्मित या रजत निर्मित चक्रादि मुद्राओं को पञ्चगव्यसे प्रक्षालित करे और मन्त्र पूर्वक जल से प्रक्षालित करे और फिर अग्नि में तपाकर प्रत्येक आयुधों का अपने मन्त्रों से आवाहन कर उनकी पाद्य, अर्घ्य, आचमनीय, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्यादि से पूजन करे। इसके बाद शिष्य अपने अग्नि के समान तेजस्वी दीक्षादाता आचार्य को प्रणाम करे। आचार्य उस तपाये हुए हेतिमुद्राभूत श्रीहरि के आयुध को स्वयं लेकर या किसी मन्त्रवेत्ता को नियुक्त करे तो वही पूर्व दिशा में मुख रखे हुए शिष्य के दक्षिणबाहु पर उस मुद्रा को रखकर अंकित करे। इनमें सुदर्शन चक्र को दक्षिण तथा पाञ्चजन्य को बायीं भुजा पर विहित मन्त्रों के साथ अंकित करे। (इनमें सुदर्शन चक्र को दक्षिण तथा पाञ्चजन्य को बायीं भुजा पर अंकित करना चाहिए।) ये दोनों आयुध समान (ही) अंकित किये जाते हैं॥७-११॥ एवं गदां धनुः खड्गं ललाटे मूर्ध्नि वक्षसि । चक्रं वा शङ्खचक्रे वा धारयेत् सर्वमेव वा ॥१२॥ ५