भारतकोश
नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary

महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

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११० नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता इसी क्रम में पाञ्चरात्रविधान के अनुरूप क्रमशः गदा, धनुष तथा खड्ग की हेति मुद्राओं को ललाटप्रदेश, मूर्ध्वस्थान तथा वक्षःप्रदेश पर अपने अपने मन्त्रों के साथ अंकित करे, इस विधि में भावनानुरूप केवल चक्र ही धारण किया जावे अथवा दोनों बाजुओं में चक्र और शंख ही धारण करे या फिर पांचों आयुधों को अंकित किया जाता है॥१२॥ तन्त्रं समाप्य देवेशं सहशिष्यः प्रदक्षिणम् । कृत्वा प्रणम्य सान्निध्यं प्रार्थ्य शेषं समापयेत् ॥१३॥ इसके पश्चात् होमविधानादि की शेष विधि उत्तरार्चनादि विधान के साथ पूर्ण कर और अपने ही नवदीक्षित शिष्य के साथ इष्टदेव नारायण की प्रदक्षिणा कर सान्निध्य की प्रार्थना कर क्षमायाचना के साथ इस यज्ञादि कार्य को सम्पन्न कर समाप्त करे॥१३॥ कुर्यात् सर्वत्र कर्मान्ते द्विजैः पुण्याहवाचनम् । आचार्यस्यार्चनञ्चैव वासःस्रग्भूषणादिभिः ॥१४॥ सर्वमङ्गलसंयुक्तमिति चिह्नानि शार्ङ्गिणः । धारयित्वा यथोत्साहं वैष्णवानभितर्पयेत् ॥१५॥ वह इस कर्म के अन्त में सर्वत्र ब्राह्मणादि के द्वारा पुण्याहवाचन सम्पन्न करे और आचार्य का वस्त्र, पुष्पमाला, भूषणादि से पूजन तथा सम्मान आदि करे॥१४॥ इस प्रकार श्रीविष्णु के आयुधरूप चिन्हों को सभी मांगलिक कर्म तथा भावना से युक्त रहकर उत्साह के अनुरूप धारण करना चाहिए तथा शक्ति के अनुसार वैष्णवजन को प्रसाद, भोजनादि से संतुष्ट करना चाहिए॥१५॥ धारयिष्यंस्ततः शिष्यमूर्ध्वपुण्ड्रान् यथाविधि । पुण्येऽह्नि नियतः स्नात्वा पूर्ववद्बद्धकौतुकम् ॥१६॥ उपवेश्याथ देवेशं भोगैर्दीपान्तमर्चयेत् । स्थण्डिलं कल्पयेत् पश्चात् पुरुषस्य प्रमाणतः ॥१७॥ इसके बाद आचार्य विधिवत् शिष्य को ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करवाते हुए आगे किसी पुण्यपर्व या पवित्र उत्सवादि तिथि को उस नियमानुचारी शिष्य को (पूर्ववत् पवित्र होकर) समीप बिठावें तथा अपने इष्टदेव श्रीहरि की विविध उपचारों से दीपदान तक अर्चना करे। इसके उपरान्त यज्ञकर्ता पुरुष के हस्त के प्रमाणानुरूप यथोचित् स्थण्डिल का निर्माण करें॥१६-१७॥ स्थानानि सैकतान्यत्र वर्णचूर्णमयानि वा । कुर्याद् द्वादश पूर्वादिचतुर्दिक्षु समान्तरम् ॥१८॥