नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)
Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary
महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा
पृष्ठ 117, कुल 176 में से
संदर्भ में पढ़ेंमें मान्य कर वृत्ति का पारंपरिक उपदेश इसे प्रदान करें॥४३॥ नित्यं विष्णुपरं कर्म कुरु निन्द्यानि मा कृथाः । सदात्मानं विबुध्यस्व मा कामेषु मनः कृथाः ॥४४॥ तुम सदा श्रीविष्णु के अनुगत इष्ट कर्मों को करते रहो तथा निन्द्य कर्मों का आचरण छोड़ो। अपने आत्मा को सदा जागृत रखते हुए रहो तथा किसी कामना से युक्त अनुष्ठानों को मन से दूर रखो॥४४॥ यजस्व नित्यमात्मेशं मा नंक्षीरन्यदेवताः । लक्ष्यस्व लक्षणैर्भर्तुर्लक्ष्णिष्टा मान्यलक्षणैः ॥४५॥ आत्माधिपति जीवेश श्रीनारायण का नित्य ही यज्ञादि से यजन (अर्चन) करना चाहिए तथा अन्य देवताओं की उपासना से दूर रहना चाहिए। अपने इष्ट का ज्ञान उनके धारण किये जानेवाले चक्रादि चिन्हों से रखो तथा इससे भिन्न अन्य लक्षणों से उन्हें मन में भी मत लाओ या इनकी कल्पना मत करो॥४५॥ उपास्व वैष्णवान्नित्यमसतो मोपसीदस्रः । गुरुं प्रणम्योमित्युक्त्वा ह्यात्मानञ्च निवेदयेत् ॥४६॥ प्रतिदिनं (नित्य) ही वैष्णवजन की सेवा सुश्रुषादि के द्वारा उपासना किया करो तथा एकान्त्यविमुख अवैष्णवजन का ससर्ग छोड़ो (अथवा उनकी संगति मत रखो)। अपने उपदेष्टा गुरु को प्रणाम करो तथा ओम् का उच्चारण करते हुए गुरु को अपने आने को निवेदित करना चाहिए॥४६॥ ततः समापिते शेषे देवमात्मनि निक्षिपेत् । गुरुं विधिवदभ्यर्च्य वैष्णवान् परितोषयेत् ॥४७॥ इस उपदेश को ग्रहण कर होमशेष की समाप्ति विधि होने के पश्चात् श्रीनारायण को अपने हृदय में स्थापित करे। यही 'न्यासविधि' है। तब अपने उपदेष्टा आचार्य की विधिवत् अर्चना करने के बाद वैष्णवजन को भी भोजन तथा दक्षिणादि देते हुए संतुष्ट करे॥४७॥ योजयिष्यन् गुरुः शिष्यं नित्यार्चनविधौ हरेः । शोभनेऽहनि नक्षत्रे देवमभ्यर्च्य पूर्ववत् ॥४८॥ मन्त्रवत्तु हुतं हुत्वा निष्ठायाथोपसादितम् । यथोक्तविधिना पूर्वं स्थापितं शुभविग्रहम् ॥४९॥ श्रीभूमिलीलासहितं परिवारैः समन्वितम् । अव्यक्तपरिवारं वा देवं सङ्ग्राह्य याजयेत् ॥५०॥ अब योगसंस्कार के लिये गुरु (आचार्य) अपने शिष्य को श्रीनारायण के नित्य