भारतकोश
नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

नारद पञ्चरात्र (भारद्वाज संहिता - वैष्णव आगम एवं प्रपत्ति-धर्म सटीक)

Narada Pancharatra Bharadwaja Samhita with Commentary

महर्षि भारद्वाज / देवर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

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११६ नारदपञ्चरात्र भारद्वाजसंहिता अर्चन करने की विधि में लगाने के लिये किसी शुभ दिन तथा नक्षत्र को देखकर तथा पूर्वविधि के अनुसार श्रीनारायण की पूजन करे। फिर मंत्रसंस्कार में किये गये विधान के अनुसार अग्नि में होम करने के बाद नित्य उपासना करने के बाद संस्कार के लिये उक्त विधि के साथ आज्याहुति तथा अन्नाहुति का होम करने के पश्चात् आवरण से उत्पन्न प्रतिष्ठाशास्त्र के अनुसार स्थापित परमेश का शुभविग्रह श्रीदेवी तथा भूमि देवी की लीला से युक्त तथा भूषणों, आयुधों एवं परिजन, परिच्छदादि के रूप में संग्रह कर फिर यज्ञ करवाये॥४८-५०॥ श्रौतदिव्यार्षकल्पानामिष्टेनान्यतमेन च । स्थापनं यजनं वापि मिश्रा ह्यत्राधिकारिणः ॥५१॥ श्रौतादि कल्प में मिश्रव्यामिश्र (दिव्य) अथवा आर्ष-कल्पों के मध्य किसी एक विधि को इष्ट समझकर उसी के अनुसार स्थापना तथा यजन विधि की जावे। मिश्र अर्थात् व्यामिश्र तथा आर्ष दोनों अधिकारी हो सकते हैं। अतः किसी भी विधि को इष्टतम मानकर उसी के द्वारा स्थापनादि कार्य किया जा सकता है॥५१॥ ततः परिगृहीतेन गुरुभिर्येन केनचित् । विधिना याजयित्वैवमथ शेषं समापयेत् ॥५२॥ और आचार्य अपने सम्प्रदाय के अनुरूप भी इन विधियों में से किसी एक विधि को इष्टतम मानकर उसी से स्थापना तथा यजन करवाकर शेष (उत्तर) विधि को पूर्ण करवाए॥५२॥ ततः स्वकाले स्वाध्यायं ततो योगञ्च कारयेत् । इज्यान्ते गुरुपूजाञ्च वैष्णवानाञ्च तर्पणम् ॥५३॥ इसके बाद उसे आचार्य के द्वारा स्वाध्याय के नियत समय पर स्वाध्याय तथा योग के नियत समय पर योग करवाना चाहिए। यजन के अन्त में अपने गुरु की पूजा और वैष्णवजन को भोजनादि से तृप्त करना भी अभीष्ट है॥५३॥ केचिच्चतुर्णां पूर्वेषां क्रमं नेच्छन्ति कर्मणाम् । सहैकदिवसे वा द्वे त्रीणि चत्वारि पञ्च वा ॥५४॥ कुछ मुनियों का मत है कि इन पूर्वकथित ताप, पुण्ड्र, नाम तथा मंत्रसंस्कार नामक इन चार कर्मों में कोई क्रम नहीं माना जाए। एक दिन में भी दो संस्कार या एक वर्ष में तीन, चार तथा पांच संस्कार भी किये जा सकते हैं॥५४॥ तदान्यतमहोमान्ते कृत्वाग्न्याद्युपसम्मुखम् । समापयेत् प्रधानञ्च न मन्त्रस्यान्यशेषता ॥५५॥ यदि एक दिन में एक साथ अनेक संस्कारगत अनुष्ठान की स्थिति हो तो किसी एक